'भास्कर' पर फूटी मंत्री की भड़ास, तो खुला 240 करोड़ के टेंडर का राज; कांग्रेस बोली- 'भ्रष्ट तंत्र के संवाहक हैं मंत्री जी'
इंदौर।
मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे में इन दिनों एक अखबार की खोजी रिपोर्ट को लेकर घमासान मचा हुआ है। दैनिक भास्कर में छपी 'मां के दूध के 70% सैंपल फेल' होने की खबर पर सूबे के स्वास्थ्य राज्य मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल बुरी तरह बिफर गए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर अखबार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए 'शर्म करो दैनिक भास्कर' तक लिख डाला। इस हाई-प्रोफाइल विवाद पर 'सबकी खबर' में मंत्री जी की भाषा शैली पर कड़े सवाल उठाए हैं और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया है।
यह रिपोर्ट छपी थी अखबार में...
दैनिक भास्कर के सीनियर इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर रोहित श्रीवास्तव ने भोपाल के मानसरोवर मेडिकल कॉलेज की लेबोरेटरी के साथ मिलकर एक रिसर्च आधारित खबर प्रकाशित की थी। इस रिसर्च में 50 महिलाओं के दूध के सैंपल लिए गए थे, जिसमें दावा किया गया कि आधुनिक जीवनशैली, एसी में ज्यादा रहने और धूप न लेने के कारण मां के दूध में कैल्शियम की भारी कमी पाई गई है। साथ ही बच्चों की हड्डियों के लिए जरूरी पोषक तत्वों की कमी और आयरन-तांबे जैसे तत्वों की अधिकता का दावा किया गया। अखबार का उद्देश्य माताओं को जागरूक करना था, लेकिन इस खबर को देश की संस्कृति पर हमला बताते हुए मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल ने सोशल मीडिया पर इस पर 'क्रॉस' का निशान लगाकर तीखी आपत्ति दर्ज कराई। मंत्री ने लिखा कि दैनिक भास्कर शर्म करो, अपनी मां के दूध को ना लजाओ। पाश्चात्य संस्कृति से प्रेरित ऐसे गिरोह झूठे इन्वेस्टिगेशन और प्रयोगशालाओं का उल्लेख कर भ्रामक खबरें फैला रहे हैं। उन्होंने इस खबर और इसमें शामिल प्रयोगशाला की जांच के आदेश भी दे दिए हैं।
मंत्री की आपत्ति पर सियासत
मंत्री जी के इस उग्र रूप पर सियासत भी गरमा गई है और विपक्ष ने उन्हें आड़े हाथ लिया है। कांग्रेस के पूर्व मीडिया अध्यक्ष केके मिश्रा ने मंत्री पटेल की भाषा शैली पर बेहद सख्त आपत्ति जताते हुए उन्हें 'भ्रष्ट तंत्र का संवाहक' करार दे दिया है। दूसरी तरफ, सबकी खबर ने अपने तथ्यात्मक विश्लेषण में मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल की मंशा पर कई गंभीर सवाल दागे हैं। मध्य प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग भ्रष्टाचार के मामले में टॉप तीन में आता है, तो अस्पतालों में जांच के नाम पर होने वाले घोटालों पर मंत्री जी ने कभी ऐसी सख्ती क्यों नहीं दिखाई? सबकी खबर ने एक बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि केंद्र सरकार ने राज्य में होमोग्लोबिन जांच के लिए ₹240 करोड़ भेजे थे, जिसका टेंडर होना था। एक ठेकेदार ने ₹120 करोड़ में ही काम करने का टेंडर डाला, तो कमीशन खोने के डर से अधिकारियों ने उसे बाहर करने की कोशिश की। बाद में लोकायुक्त और EOW में शिकायत के डर से टेंडर ही कैंसिल कर दिया गया। मंत्री जी इस पर खामोश क्यों हैं? क्या उप-मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला या एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (ACS) स्वास्थ्य राज्य मंत्री को लूप में नहीं लेते और इसी प्रशासनिक बेबसी की भड़ास मंत्री जी अखबार पर निकाल रहे हैं?
तो कहा हैं जनसंपर्क विभाग...
अगर अखबार की खबर तकनीकी रूप से गलत थी, तो स्वास्थ्य आयुक्त, जनसंपर्क विभाग या खुद उप-मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसका आधिकारिक खंडन करना चाहिए था। लेकिन सिस्टम के जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग मुंह पर टेप लगाए बैठे रहे और राज्य मंत्री सोशल मीडिया पर मां के दूध जैसे संवेदनशील विषय को संस्कृति से जोड़कर युद्ध लड़ते नजर आए। अब देखना यह है कि मंत्री जी द्वारा बैठाई गई जांच में लेबोरेटरी झूठी साबित होती है या फिर यह कार्रवाई सिर्फ सच को दबाने और मीडिया को डराने का एक सरकारी हथकंडा बनकर रह जाती है।

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