भोपाल। 
मध्य प्रदेश के सरकारी विभागों में इस वक्त 'टेंडर-टेंडर' का गंदा खेल चल रहा है। करीब 2000 करोड़ रुपये से ज्यादा के टेंडर दांव पर हैं और दलालों का एक तगड़ा सिंडिकेट एक्टिव हो चुका है। खेल ऐसा है कि जिन्हें मलाई मिल गई, वे उसे पचाने में लगे हैं और जो रेस से बाहर हो गए, वे शिकायतें कर रायता फैला रहे हैं। इस महा-घपले पर अब सियासत भी गरमा गई है।
जीतू पटवारी का तीखा हमला: "सब भ्रष्ट हैं, हम खोलेंगे पोल"
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने उज्जैन में सीधा हमला बोलते हुए कहा है कि बीजेपी सरकार में ऊपर से नीचे तक सब भ्रष्ट हैं। इनका एक ही बिजनेस है— करप्शन। सिंहस्थ की तैयारियों के नाम पर उज्जैन में छोटे-बड़े टेंडरों में जमकर घपला हो रहा है। कांग्रेस इन सारे टेंडरों पर नजर रख रही है और जल्द ही जनता के सामने इसका पूरा पोस्टमार्टम करेगी कि किसने कितना पैसा खाया।
इन 5 विभागों में चल रहा है असली 'खेल'
आदिम जाति कल्याण (₹242 करोड़):
संदीपनी स्कूलों में स्मार्ट क्लास और कंप्यूटर खरीदी के लिए ₹242.18 करोड़ का ठेका हुआ है। आरोप है कि एक खास दलाल को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों को मरोड़ा गया। विभाग की ही सहायक आयुक्त नेहा मारविया की एक अनसाइंड रिपोर्ट भी लीक हुई है, जिसमें गड़बड़ी का जिक्र है। मामला EOW तक पहुंच गया है।
स्वास्थ्य विभाग (₹240 करोड़): पूरे प्रदेश में हीमोग्लोबिन मीटर सप्लाई करने का ₹240 करोड़ का टेंडर है, जबकि जानकारों के मुताबिक यह काम मात्र 5 से 7 करोड़ का है। शिकायत होने पर CM ऑफिस के दखल के बाद इसे कैंसल किया गया था, लेकिन कुछ ही दिन बाद शर्तें बदलकर दोबारा टेंडर निकाल दिया गया ताकि चहेते ठेकेदार को अंदर लाया जा सके।
स्कूल शिक्षा विभाग (₹98 करोड़): यहाँ ₹98 करोड़ का एक टेंडर निरस्त हुआ है। चर्चा है कि उत्तर प्रदेश की कोई महिला दलाल इस टेंडर को दोबारा हथियाने के लिए भोपाल में एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है।
स्कूल यूनिफॉर्म (₹550 करोड़): मोहन यादव सरकार ने बच्चों को पैसे देने के बजाय सिली-सिलाई यूनिफॉर्म देने का फैसला किया। फैसला अच्छा है, लेकिन 92 लाख बच्चों के लिए करीब 2 करोड़ गणवेश सप्लाई के इस ₹550 करोड़ के भारी-भरकम बजट को लपकने के लिए दलाल टूट पड़े हैं। जून भर इसका बैकडोर खेल चलेगा।
उज्जैन विकास प्राधिकरण (₹1100 करोड़): यह सबसे बड़ा अजूबा है। सिंहस्थ से पहले मंदिरों के विकास के लिए ₹1100 करोड़ का टेंडर निकाल कर ठेकेदार भी तय कर दिया गया। लेकिन सच यह है कि UDA के पास फूटी कौड़ी नहीं है, सरकार से मंजूरी नहीं है और जमीन का अधिग्रहण तक नहीं हुआ है। अधिकारियों का दावा है कि वे 'टेंपल बॉन्ड' लाकर जनता से पैसा उठाएंगे, जबकि इसके लिए सेबी (SEBI) की अनुमति तक नहीं है।
साख दांव पर, क्या करेंगे सीएम?
साफ-सुथरी छवि वाले प्रमुख सचिव गुलशन बामरा जैसे अफसर और खुद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पारदर्शिता चाहते हैं, लेकिन कुछ मंत्रियों और दलालों का 'पर्सनल इंटरेस्ट' हावी है। ठेकेदारों को लोकायुक्त या EOW का कोई डर नहीं है, क्योंकि उन्हें पता है कि पहले माल सप्लाई कर के पैसा जेब में डालो, बाद में जांच एजेंसियों को 'मैनेज' कर लिया जाएगा। इंदौर, देवास, भोपाल और ग्वालियर के बड़े दलालों के नाम अब सरेआम बाजार में गूंज रहे हैं। अब देखना यह है कि जीरो टॉलरेंस का दावा करने वाले मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इन दलालों पर कब और कितना कड़ा हंटर चलाते हैं!