पानी से फैल रही गंभीर बीमारी, कोरबा में 237 फ्लोरोसिस मरीजों की पहचान
कोरबा: छत्तीसगढ़ के ऊर्जाधानी कहे जाने वाले कोरबा जिले के ग्रामीण इलाकों से पानी की किल्लत और प्रदूषण को लेकर एक बेहद डरावनी और हैरान करने वाली खबर सामने आई है। जिले के कई गांवों में पीने के साफ पानी की विकराल समस्या तो है ही, लेकिन इससे भी खतरनाक बात यह है कि यहां के हैंडपंपों और जलस्रोतों से फ्लोराइडयुक्त पानी निकल रहा है। यह दूषित पानी स्थानीय ग्रामीणों के लिए 'धीमा जहर' साबित हो रहा है, जो असमय ही लोगों को अपंगता और मौत की ओर धकेल रहा है।
दांतों का पीलापन और झुकती रीढ़ की हड्डी बयां कर रही दर्द
मासूम बच्चों के दांतों में असमय आया पीलापन और ढलती उम्र से पहले ही बुजुर्गों की तरह झुक चुका नौजवानों का शरीर— यह खौफनाक मंजर कोरबा जिले के किसी एक परिवार का नहीं है। स्वास्थ्य विभाग के ताजा सर्वे के मुताबिक, जिले के 59 गांवों के 237 लोग गंभीर रूप से फ्लोरोसिस बीमारी की चपेट में आ चुके हैं।
फ्लोरोसिस कोई सामान्य बीमारी नहीं है, बल्कि यह पानी में मौजूद फ्लोराइड के कारण शरीर में पहुंचने वाला वो धीमा जहर है, जो धीरे-धीरे हड्डियों को भीतर से खोखला और कमजोर कर देता है। इस भयावह स्थिति के लिए सीधे तौर पर लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग को जिम्मेदार माना जा रहा है, जिसका बुनियादी काम ग्रामीणों को शुध्द पेयजल उपलब्ध कराना है, लेकिन विभाग इसमें पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है।
'बिन पानी सब सून' की मार झेल रहे ग्रामीण
कहते हैं कि जल ही जीवन है, लेकिन कोरबा के इन प्रभावित गांवों के लोगों के लिए यही जल उनके जीवन का सबसे बड़ा दुश्मन बन गया है। साफ पानी का कोई दूसरा जरिया न होने के कारण ग्रामीण इसी जहरीले पानी को पीने और खाना पकाने के लिए मजबूर हैं। नतीजा यह है कि लोगों के जोड़ों में असहनीय दर्द रहने लगा है, कूबड़ निकल रहा है और दांत सड़ रहे हैं।
लाइलाज है यह बीमारी, सिर्फ दर्द कम करने की कोशिश
इस समस्या का सबसे स्याह और चिंताजनक पहलू यह है कि मेडिकल साइंस में फ्लोरोसिस का कोई स्थायी इलाज (क्यूर) मौजूद नहीं है। एक बार इसकी चपेट में आने के बाद मरीज को जीवनभर केवल दर्द निवारक दवाइयों के सहारे ही कटना पड़ता है। हड्डियों के इस टेढ़ेपन को दोबारा ठीक करना नामुमकिन है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) ने मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए बताया:
"स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने प्रभावित गांवों में विशेष कैंप लगाकर लोगों के सैंपल लिए थे। जांच में अब तक 214 मरीज डेंटल फ्लोरोसिस (दांतों की खराबी) और 23 मरीज स्केलेटल फ्लोरोसिस (हड्डियों की विकृति) से पीड़ित पाए गए हैं।"
महज 1 साल के आंकड़ों ने उड़ाए होश, विभाग मौन
चौंकाने वाली बात यह है कि फ्लोरोसिस के शिकार इन 237 मरीजों का यह आंकड़ा पिछले 10-20 सालों का नहीं, बल्कि महज बीते 1 साल का है। नियम के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग को जहां भी ऐसे मरीज मिलते हैं, उस पानी के सोर्स की जानकारी तुरंत PHE विभाग को दी जाती है ताकि वहां फ्लोराइड फिल्टर प्लांट या शुद्ध पानी की वैकल्पिक व्यवस्था की जा सके।
लेकिन धरातल पर PHE विभाग के अधिकारियों की सुस्ती साफ बयां कर रही है कि उन्हें ग्रामीणों की जिंदगी की कोई परवाह नहीं है। महज एक साल में 59 गांवों का इस कदर प्रभावित होना सरकारी दावों की पोल खोलता है। अब देखना होगा कि इस गंभीर लापरवाही के बाद भी जिम्मेदार अफसरों पर कोई कड़ी दंडात्मक कार्रवाई होती है या ग्रामीणों को यूं ही घुट-घुटकर मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा।

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