भोपाल। 
अमेरिका के  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह टेरीफ 50% बढ़ा दिया है उससे भारत के फार्मा कंपनियों को क्या असर होगा क्योंकि भारत की फार्मा  कंपनियां बड़ी तादाद में दवाइयां अमेरिका  को सप्लाई करती हैं इस पर वाकई यदि  दवाइयां महंगी होंगी तो अमेरिका में क्या रिएक्शन होगा? क्या भारत के बजाय यह  दवाइयां चाइना से जाएंगी? इस मामले को समझने के लिए जानेमाने चिकित्सक और फार्मा को बहुत नजदीक से समझने वाले डॉक्टर भुवनेश गर्ग से बात की उन्होेंने बताया कि अमेरिका में हथियार के अलावा मैं समझता हूं बाकी किसी तरह का कोई और बहुत वैश्विक  पैमाने पे उत्पादन नहीं होता जिससे दुनिया की आम जीवन पे या इंडस्ट्री पे कोई असर  पड़े। अब यहां पर फार्मा इंडस्ट्री की बात  है तो फार्मा इंडस्ट्री में से करीब-करीब  40% दवाइयां जो अमेरिका को लगती हैं वो भारत से सप्लाई होती हैं। कितना बड़ा लेवल है ये यहां ये समझना होगा और नॉर्मल तौर पर जीवन  के लिए आवश्यक जितनी भी एंटीबायोटिक्स  यहां तक कि पैरासिटामॉल तक भी भारत से बनकर जाती है और अमेरिका का जो फेडरल ड्रग एडमिनिस्ट्रेटिव सिस्टम है यूएसएफडीए कहते हैं उसको वो बहुत सख्ती से अपने मानकों के ऊपर कारवाई करता है जिससे कि दवाओं की क्वालिटी बरकरार रहे और उसके सारे पैरामीटर्स को भारत की ही नहीं चाइना से ले दूसरे सब जगहों के जहां-जहां से दवाइयां अमेरिका जाती हैं, बहुत सख्ती से उसका पालन करते हैं क्योंकि वह एक झटके से पूरा बेच पूरा सिस्टम रिजेक्ट कर देते हैं। तो वह दवा कंपनियों पे बहुत भारी पड़ता है। अब यहां यह समझने की बात होगी कि जो दवा हमारे यहां ₹4000 की बनती है वो दवा  वहां पर ₹400 से लेके ₹4 लाख तक बिकती है।  क्योंकि अमेरिका का जो ड्रग डिलीवरी सिस्टम है वह पूरा नेशनल हेल्थ सर्विज के  जरिए गवर्न होता है। इंश्योरेंस के जरिए गवर्न होता है। और जैसे यहां पर हम कहते हैं कि हमारे देश में दलाली सिस्टम चलता है। तो इस तरह से अमेरिका में डॉक्टर एनएचएस और इंश्योरेंस का नेक्सेस चलता है। वो तय करते हैं कि किस प्रक्रिया की कीमत कितनी होगी, किस दवाई की कीमत कितनी होगी क्योंकि उसमें सबके कमीशन बंधे पड़े हैं। तो यहां पर यह बहुत बड़ा खेल चल के आता है कि इसलिए वहां पर बहुत महंगा उपचार है क्योंकि इंश्योरेंस से है इसलिए किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। सरकार की जेब से जाता है इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ता। अब यहां पर ट्रंप बाबा जो बहुत बड़े व्यापारी समझते हैं खुद को और उनके बहुत बड़े-बड़े बिजनेस हैं भी वो इंडस्ट्रियल से लेके रियल सेक्टर से लेके सारे उसमें उनका खेल है तो वो ये व्यापार समझ रहे हैं कि मैं ये रेट बढ़ाऊंगा तो उससे मेरे देश को फायदा होगा तो इससे कोई फायदा नहीं होना है। जो रेट तुम बढ़ा रहे हो वो पलट के और मल्टीप्लाई हो के आज समझो ₹4000 की दवा पे तुमने 40% बढ़ाया लेकिन वो 4 लाख की दवा पे कितने परसेंट बढ़ गया तो ये इतना गुना हो के तुम्हारे ही देश में पड़ना है भारत में कोई फर्क नहीं पड़ना मैं समझता हूं उससे लेकिन हां यहां ये एक बहुत सख्ती से कहने की बात है जो मैं खुल के लगभग अपने हर इंटरव्यू में कहता हूं कि सिस्टम किस तरह से काम करता है तो यूएसएफडीए की सख्ती की वजह से देश में दो बार तीन बार इन दवा कंपनियों पे छापे पड़ते हैं। आप सोचिए हमारे देश में हमारे देश की एजेंसियां निर्लिप्त बैठी रहती हैं। पर बाहर से उनकी एजेंसी आकर पूरा छापा मार जाती हैं। उनके ऊपर पूरे सेंशंस लगा जाती है और वो सामने हर दिन शेयर मार्केट में दिखता है। देखिए यहां पर बहुत सीधी सी बात है कि
फर्क इस तौर पे पड़ेगा कि अब किस कंट्री की दवाइयों में कितना प्रॉफिट और कितना टैक्स कितना टेरिफ बन रहा है। संभवत चाइना पर अभी इन्होंने ज्यादा खिलवाड़ नहीं किया है ट्रंप ने। लेकिन जिस तरह से रशिया, इंडिया और चाइना जो रीच एक संस्था बनाने की बात हो रही है तो मुझे लगता है कि पगलाहट में ट्रंप साहब अब इन तीनों के  खिलाफ एक कॉमन कंसेंस लेने की कोशिश करेंगे जो वो बात कर भी रहे हैं कि मैं यह कर दूंगा, मैं वो कर दूंगा। यहां इशू क्या  है कि आज की तारीख में जो भी दवा कंपनियां हैं वह कितना भी टेक्स बढ़ जाए अगर मुझे क्वालिटी मेडिसिन इंडिया से मिल रही है तो मैं इंडिया से ही लूंगा। और एक जो व्यवस्था चलती चली आ रही है उस व्यवस्था को एकदम नहीं तोड़ा जा सकता। अमेरिकी की जनता को इसलिए फर्क नहीं पड़ना कि वहां पर पूरा इलाज इंश्योरेंस के जरिए गवर्न है। आम पब्लिक की जेब से कोई पैसा नहीं जाता उसमें। तो उसको दो 100 की मिल  रही है कि 500 की मिल रही है उसको कोई फर्क नहीं पड़ता। हां फर्क किसको पड़ेगा? अमेरिकी संस्थाओं को पड़ेगा। इंश्योरेंस कंपनी को पड़ेगा। नेशनल हेल्थ सर्विज जो उनकी मेन संस्था है जो पूरा बजट जनरेट करती है उसको पड़ेगा। तो अब इसमें क्या हुआ है कि ऑन एन एवरेज यह आकलन किया गया है कि जो टैक्स बढ़ाया है टेरिफ बढ़ाया है ट्रंप सरकार ने उसकी वजह से करीब $2400 पर पर्सन पर ईयर खर्चा बढ़ जाने वाला है तो ये किसको असर करने वाला है यह अमेरिकी सरकार को असर करने वाला है इसलिए अमेरिका की सारी विपक्षी संगठन दल सारे नेता इवन निक्की हेली तक ने कहा है कि यह पागलपन का निर्णय है इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था पे असर पड़ेगा और आप देखिए 1.5 लाख करोड़ डॉलर का नुकसान पहले दिन इस घोषणा के बाद से अमेरिकी बाजार में हुआ। तो सर आप बेशक हम कहें कि बीमा कंपनियों को इसका असर पड़ेगा तो बीमा कंपनियां कौन सा घाटने में जाएंगी? वो अपनी जो उनकी जो शुरुआती फीसेस है वो बढ़ा देंगे वो लोग। कहा ना कि $2400 पर पर्सन अमेरिकी नागरिक के ऊपर असर पड़ जाने वाला है। यह अमेरिकी नागरिक को नहीं पड़ेगा पर सरकार को पड़ेगा। तो आपकी जीडीपी तो चौपट होनी है ना। अपन चाहे कितना भी अपने संतोष के लिए कहें लेकिन चाइना बगल में बैठा है और वहां से भी दवाइयां जा रही है तो कुछ तो असर आएगा भारतीय कंपनियों पर देखिए भारतीय कंपनियां वैसे ही बहुत सीमित प्रोडक्शन कर पा रही हैं क्योंकि हमें जितने रॉ मटेरियल मिलते हैं वो रॉ मटेरियल हम इंडिया में बहुत कम पैदा कर पाते हैं। जितनी दवाइयों से रिलेटेड रॉ मटेरियल इवन पैरासिटामॉल के लिए जो हमको चाहिए वो पैरासिटामॉल रॉ मटेरियल भी मल्टीविटामिन रॉ मटेरियल भी चाइना जैसी कंट्रीियों से आते हैं। तो यहां मैंने इसलिए कहा कि जो ये रीच जो संस्था बन रही है मैं समझता हूं कि यह एक बहुत बड़ा काम होने जा रहा है। जिसकी वजह से दवाओं का निर्माण बहुत आसान और सुरक्षित हो जाएगा। क्वालिटी बेस्ड हो जाएगा। अब हम यहां पर क्वालिटी कितनी कंट्रोल कर पाते हैं ये एक बहुत बड़ा मेजर इशू है। जैसे मैंने कहा यूएसएफडी साल में दो बार तीन बार एयर रेंडम बिना बताए आपके यहां छापा मारती है। और वो जो जो गड़बड़ियां पकड़ती है वो हाइजीन से लेके क्वालिटी से लेके हर चीज को चेक करते हैं  और उसका पूरा प्रोडक्शन खत्म कर देते हैं कि नहीं चाहिए हमें। तो कंपनियों को तो  बहुत सुरक्षा रखना पड़ती है। लेकिन अनफॉर्चूनेटली हमारे देश में दवा मानक के ऊपर कोई स्टैंडर्ड नहीं है। आज हमें आज भी नहीं पता होता कि जेनरिक है कि अच्छी कंपनी है। उसमें जो दवा हमको मिल रही है वो ठीक होगी कि नहीं होगी। उसमें कंपोनेंट पूरे होंगे कि नहीं होंगे। हम लगातार देखते हैं कि कितना फ्यूरियस कितनी फेक मेडिसिन हर साल हर महीने हर हफ्ते पकड़ाई जाती हैं। दिल्ली में करोड़ों अरबों की दवाइयां हर बार पकड़ाई जा रही हैं। तो ये घर-घर में जो बन रही हैं और अब तो यहां तक हो गया है कि बड़े-बड़े अस्पताल जिनके यहां खपत बहुत ज्यादा है वो उन्हीं अस्पताल के लिए फिक्स्ड ब्रांड फिक्स्ड नाम का एक प्रोडक्ट नया बना के दे देते हैं जो वहीं मिलेगा। और उसकी ₹400 की कीमत होती है। उसको 4000 कर देते हैं। उसको ₹00 कर देते हैं। यह सब खेल चल रहा है। तो हमारे यहां ना तो मानक के ऊपर कंट्रोल है ना प्राइस के ऊपर कंट्रोल है। तो इसको कैसे रोका जाएगा? इसके लिए यूएस एफडीए जैसा कोई  पैटर्न क्या हमारे यहां ला सकते हैं। लेकिन हमारे यहां तो सब दिखावट है। अमेरिका के राष्ट्रपति भारतीय मीडिया में अपनी जोकर वाली छवि बना के बैठ गए हैं। सवाल ये है कि वो रोज ना कोई रोज ना रोज कोई ना कोई बयान भारत के खिलाफ दे रहे हैं। अब ये कह रहे हैं कि भारतीय लोगों को मुझे यहां से डिपोर्ट करना है। अधिक से अधिक रोजगार छीनने हैं। ये लगातार खुले आम बयान आ रहे हैं और सबसे ज्यादा जो अमेरिका में डॉक्टर हैं वो भारतीय मूल के डॉक्टर हैं। अगर ट्रंप की बुद्धि इसी तरह से आगे चलती रही और इसी तरह से वो भगाने पे आ गए तो यह जितना भी ब्रेन है जो एक तरह से बाहर चला गया था यह ब्रेन तो वापस हमारी कंट्री में आ जाएगा। अब इस ब्रेन को हम कैसे उपयोग कर पाते हैं? यह हमारी सरकारों पर निर्भर करेगा। लेकिन इन डॉक्टरों को तो आदत है महंगी दवाइयां लिखने की। इतना महंगा इलाज वहां अमेरिका में है।