दूसरे की पीड़ा को जब तक अनुभव नहीं करेगा, तब तक वो साधु स्वभाव हो ही नहीं सकता वो एक पाखंडी हो सकता है
सीहोर, भोपाल। सबकी खबर।
सिहोर जिले के कुबरेश्वर धाम क्राउड कंट्रोल नहीं हो पा रहा है। इसके बाद भी पूरी रात भीड़ बढ़ती चली जा रही है। वहां लगभग 36 से 40 घंटे से भोपाल से सिहोर का हाईवे पूरी तरह से बंद पड़ा हुआ है। मंगलवार को वहां भीड के दबाव के कारण दो लोगों की मौत हुई थी और तमाम लोग घायल हैं। कुछ गंभीर हैं भोपाल में भर्ती हैं। इसके बाद बुधवार सुबह कुबेरेश्वर धाम के जो पीठाधीश्वर हैं पंडित प्रदीप मिश्रा वो रायपुर से सीहोर पहुंच गए हैं और वे एक विशाल जुलूस निकाल रहे हैं। कावड़ यात्रा जिसको आप कह सकते हैं। मंगलवार को जिन दो महिलाओं की मौत हुई है वह अभी तक उनकी डेथ बॉडी घर नहीं पहुंच पाई है और आज पंडित प्रदीप मिश्रा को नाचते देखा जा रहा है। झूमते हुए देखा है। दुख इस बात का होता है कि आप देखिए कि एक और आपके भक्तों की आपको चाहने वालों की लाशें बिछी हुई हैं। अव्यवस्था का आलम है। लेकिन आप इस बात को मानने को तैयार नहीं है। उनके प्रति संवेदना नहीं है। आप किस तरह के कथावाचक हैं। आप शिव कथा करते हैं दुनिया में घूम-घूम के लेकिन इतनी संवेदना तो रखना चाहिए कि जो जिन महिलाओं की कल मौत हुई है उनके शव घर नहीं पहुंचे और आप यहां नृत्य कर रहे हैं। आप नाच रहे हैं आप जलूस निकाल रहे हैं। आप ढोल बजवा हे हैं। ये तमाम सारी चीजों पर सबकी खबर ने मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार महेश श्रीवास्तव से चर्चा की श्री श्रीवास्तव ने आध्यात्म पर बहुत सारी पुस्तकें लिखी हैं। महेश श्रीवास्तव वे पत्रकार हैं जिन्होंने मध्य प्रदेश गान भी लिखा है।
आज की पीढी को धार्मिक ग्रंथों के कर्म को समझना होगा
श्री श्रीवास्तव ने कहा कि सब में पहले तो हमारे यहां यह समझना होगा कि शिव, ब्रह्मा या विष्णु यह उन तीन प्रकार की शक्तियों के प्रतीक हमारे यहां माने गए थे जिनका कोई रूप नहीं होता है। बाद में कर्मकांड के माध्यम से या बाद के जो ऋषि मुनि हमारे यहां हुए हैं। उन्होंने इनको रूप प्रदान कर दिया है। यह केवल वो शक्तियां हैं जिनके हम आंतरिक मन से आराधना कर सकते हैं। जिनके बारे में हम ध्यान कर सकते हैं। जिनको हम अनुभव कर सकते हैं। तो इन शक्तियों के माध्यम से जो हमारे यहां पे विभिन्न प्रकार के ग्रंथ बन गए हैं। उन ग्रंथों में चमत्कारिक इन शक्तियों के कई चमत्कारिक प्रभाव कई चमत्कारिक इनकी शक्तियां वो व्यक्त कर दी गई हैं। और हमारे यहां क्योंकि प्राय लोग ना तो धार्मिक ग्रंथों को पढ़ पाते हैं। ना उस प्रकार गहराई से दार्शनिकता से उस चीज को समझ पाते हैं। अतः वे उन कथावाचकों पर विश्वास कर लेते हैं। जो यह कहते हैं कि यदि ऐसा करोगे, तो ऐसा चमत्कार हो जाएगा।
मनुष्य की आंतरिक कमजोरियों को भुनाते हैं कथावाचक
यह भगवान तुम्हारा वह कर देगा, यह भगवान तुम्हारा वह कर देगा। यह सारे चमत्कार की जो बातें होती हैं, यह हमारे कथावाचक जो हैं, मनुष्य की आंतरिक कमजोरियों में भुनाते रहते हैं। दरअसल क्या है कि अगर ऐसा ही होना चाहिए, हमें यह सोचना चाहिए, हम कृष्ण के भक्त हैं। मगर कृष्ण ने अपने जीवन में कितने संघर्ष किए, कितना ज्यादा अपने कष्ट उठाए हैं। क्या कृष्ण के बारे में कभी कह सकते हैं? वह अगर भगवान थे तो वह अपने आप को उन कष्टों से नहीं बचा सकते थे। क्या राम को 14 वर्ष वनवास झेलना पड़ता? क्या लक्ष्मण को शक्ति लगती? मगर हम इतने इस प्रकार के लोग हैं जो कर्म की शक्ति जो वास्तविकता और यथार्थ है जीवन का उसको हम देखना नहीं चाहते। हम केवल अंधभक्ति से किसी भी रूप में अपना लाभ प्राप्त करना चाहते हैं। हमारे यहां हर जगह कहा गया है कि कार्य और कारण का सिद्धांत होता है। जैसे कर्म आप करोगे उसके अनुसार आपको फल मिलेगा। केवल गीता में नहीं रामचरितमानस में जो जस करें सो तस फल चाखा। मगर हमने क्या है कि हमारी एक प्रवृत्ति हमारे समाज में ये बन गई है कि हम कर्म से विमुख होते जा रहे हैं और मुफ्त में जो चीज मिल जाए चाहे वो राजनीतिक रूप से मिले चाहे वो हमें धर्म के माध्यम से मिले या धर्म के नाम से कहिए या धर्म के आडंबर के माध्यम से मिले। हम ये चाहते हैं कि हमें वो मिल जाना चाहिए और हमें कुछ करना नहीं पड़े। आज जबकि विज्ञान इतने आगे बढ़ गया है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी इतना आगे बढ़ गया है। अंततः होता क्या है? मैं कई उदाहरण जानता हूं। जो लोग जाते हैं कोई पंडित के पास जाता है, कोई कथावाचक के पास जाता है। कोई जाता है अपने किसी पीर भूत के पास, कोई भभूत लेता है, कोई धागा बंधवाता है। होता कुछ नहीं है। अंतत जाना उसको वहीं पड़ता है। आज एलोपैथी आज की चिकित्सा जो पद्धति है उसी की शरण में जाना जाना पड़ता है।
समाज को एक प्रकार से मूर्ख बनाने की पद्धति विकसित हो गई हैं
लोकतंत्र में जहां बहुत सी खूबियां हैं वहां बहुत सी बुराइयां भी हैं। लोग जिसे कहते हैं जो वोट मतदाता है वो हमारा सब कुछ सर्वे सर्वा होता है। हमारे राजनीतिज्ञों का भी और राजनीतिज्ञों के माध्यम से प्रशासन चलता है। आप इस समाज में कई गलतियां देखेंगे। मुफ्त का चाहे हम उनको बांटने की बात हो या इस प्रकार के जो आडंबर करने वाले लोग हैं कथावाचक आप कथावाचकों का सुनिए क्या हो रहा है एक किस्से नहीं है कुछ लोग जेल में हैं। कुछ लोगों ने व्यभिचार किया है। कुछ लोग बुराइयों से भरे हुए हैं। कुछ लोगों ने रिश्वत ली है। कुछ लोगों ने पैसा खाया सब किया है। क्योंकि यह कथावाचक ज्ञान जो आध्यात्मिक ज्ञान होता है उसके उपासक नहीं होते हैं। यह लोग कुछ ग्रंथों को पढ़ लिया। उनको लेकर के समाज को एक प्रकार से मूर्ख बनाने की पद्धति ये होती है इनकी और इस प्रकार से क्योंकि हमारा समाज कई पीड़ाओं से ग्रस्त भी है। हमारे संस्कारों में कई प्रकार के हम जादूगर आता है तो हम गांव से देखते थे। जादूगर आ गया। भीड़ लग जाती थी हमारे उसका जादू देखने का वो हाथों की सफाई होती है। जिस प्रकार वो हाथों की सफाई होती है। इस प्रकार से यह एक बौद्धिक सफाई है। एक मानसिक कमजोरियों का लाभ उठाने का पूरा का पूरा षड्यंत्र है। क्योंकि कहीं दुनिया में ऐसा नहीं होता है। अगर केवल आप रुद्राक्ष पहनने से या कोई अगर अगरबत्ती लगा देने से या कोई और टोटका कर देने से टोटका हमारे ग्रंथों में भी आए हैं। इसमें कोई संदेह की बात नहीं है। मगर इन टोटकों से ही अगर यह सब होता तो फिर ये इतने सारे बड़े-बड़े हमारे यहां महाभारत क्यों होता हमारे यहां रामचंद्र जी को क्यों जाना पड़ता है कि रावण को मारना पड़ता।
भीड़ को नियंत्रित करने का उत्तरदायित्व आयोजकोंं का ही होना चाहिए
एक वास्तविकता तो इस बात की समझना पड़ती है कि जहां भी भीड़ हो वहां हमारे यहां शासन या प्रशासन क्योंकि वह राजनीतिक लोगों से नियंत्रित होता है। इसलिए प्राय उनमें कोई ऐसा काम नहीं करेगा जिसके कारण भविष्य में जब मतदान होगा तो उसको नुकसान हो सके। सब में बड़ी कमजोरी इस बात की है। मगर इसके बावजूद क्योंकि प्रशासन और शासन इसलिए होता है कि वो जनता की दुख दर्द की कष्टों की इन सब के निवारण के प्रयत्न करें तो उसको ये कोशिश करना चाहिए कि इस प्रकार के जो जो भी आयोजन होते हैं जिनमें लाखों लोग एकत्रित होते हैं और जिनमें दुर्भाग्यवश मृत्यु भी हो जाती है अव्यवस्था के कारण उनमें कुछ ना कुछ ऐसी व्यवस्था करें कि जिसके कारण या जिसके कारण इन लोगों को ये कष्ट नहीं उठाना पड़े। मगर उसके साथ एक बात है। हम हर बात में पुलिस को नहीं कह सकते। हमारे पास जितना पुलिस फोर्स है आप देखेंगे कितना पुलिस फोर्स तो केवल राजनेताओं की सुरक्षा में ही लग जाता है। बाकी हमारे यहां चोरी डकैती इस सब में लग जाता है। करना ये चाहिए प्रशासन को कि उस व्यक्ति को जो कथावाचक है और उसके यहां जितनी भीड़ एकत्रित हो रही है उसका उत्तरदायित्व देना चाहिए उसको कि यह आपका कर्तव्य है कि आप चाहे अपने स्वयंसेवक लगाइए चाहे आप कुछ कीजिए। किसी भी प्रकार की अव्यवस्था नहीं होना चाहिए जिसमें मनुष्य के जीवन से खिलवाड़ हो जाए। दूसरी बात जैसा तुमने कहा कि इंदौर और भोपाल के बीच में रास्ता जाम है पूरा। यह किसी को अधिकार नहीं है कि हम अपने धर्म के लिए हम अपने किसी भी और प्रकार के कर्म के लिए लोगों का मार्ग बाधा मार्ग में बाधा पैदा कर दें या किसी भी प्रकार से लोगों को कष्ट पहुंचाएं। यह बिल्कुल एक नैतिक सिद्धांत है और इस सिद्धांत के अनुरूप ही उनको ये करना चाहिए कि उनको जुलूस निकालना है वो निकालें या तो सड़क के एक तरफ से निकालें या कोई ऐसी व्यवस्था करें जिसमें उनके सब लोग लगे हुए हो चाहे पुलिस लगी हो चाहे वो लगा हुआ हो और इस प्रकार की जो अव्यवस्थाएं हैं इस प्रकार का जो लोगों को कष्ट होता है यह कथा के माथे पर कलंक है और साथ ही प्रशासन की लचर और प्रशासन की या कहिए कि राजनीतिज्ञों की जो स्वार्थपूर्ण नीतियां हैं उनका परिणाम है।
चाहे कुबेरेश्वर धाम हो या बागेश्वर जैसे अन्य धाम सबको पैसा ही कमाना है
कथावाचक की कथा तो लोग ऑनलाइन भी सुन लेते हैं। आजकल हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल है। लेकिन कथावाचकों को पैसा कैसे मिलेगा? कैसे उनके धाम बनेंगे? कैसे यह पूरा साम्राज्य स्थापित होगा? तो ये अपनी बातों में उलझा के लोगों को अपने धाम बुलाते हैं। चाहे बागेश्वर धाम हो, रावतपुरा सरकार हो या कुबरेश्वर हो, मध्य प्रदेश के चाहे वो पंडोखर हो। ये बातों में उलझा के अपनी कथा में इस तरह का संकल्प करा देते हैं कि आपको हर गुरुवार आना पड़ेगा, हर मंगलवार आना पड़ेगा, शनिवार आना पड़ेगा तभी आपके कष्ट दूर होंगे। और यह इस कारण से पूरा की पूरा क्राउड क्राउड हो जाता है हर जगह पर। सरकार कानून बना भी लें तो मनुष्य की मानसिक कमजोरियां और पाखंड इन पे कोई कितना भी कानून बना देगा इनसे आप मुक्ति नहीं पा सकते। कानून बनाना चाहिए। यह कानून इस प्रकार का होना चाहिए कि इनको नियंत्रित किस प्रकार से किया जा सकता है। मगर इस सब के लिए सब में ज्यादा आवश्यक बात यह है कि मनुष्य को स्वयं यह सोचना होगा कि हम क्या अपने मानसिक रूप से अपने जन जागरण भी कह सकते हैं आप। जन जागरण के प्रयास होना चाहिए और हमारे यहां कई लोग हुए हैं जिन्होंने जन जागरण किया। आप भूत प्रेतों के किस्से की बात करते हैं। इंग्लैंड को आप इतना आधुनिक मानते हैं। वहां पे पूरा साहित्य आप देख लीजिए। भूत प्रेतों से भरा हुआ है। आज भी वहां कई लोग जो हैं क्रिश्चियनिटी में वहां जाते हैं चर्चों में जाते हैं और किस प्रकार के पाखंड करते हैं। एक जमाने में तो वहां चर्च के जो पादरी हुआ करते थे वो टिकट बेचा करते थे स्वर्ग के। तो यह मनुष्य की जो कमजोरियां हैं यह केवल भारत में नहीं है। यह सब जगह हैं। किंतु अन्य स्थानों पर लोगों ने उन पे थोड़ा नियंत्रण प्राप्त किया है। और हमारे यहां इस प्रकार का नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। अब जहां तक सब में पहले तो यह है कि जन जागरण किया जाए। लोगों को समझाया जाए। लोगों को ये और लोग इस बात को माने। थोड़ा अध्ययन करें। थोड़ा ज्ञान की तरफ बने। पाखंड को छोड़ें। तो इससे हमें थोड़ी बहुत मुक्ति मिल सकती है क्योंकि मैं मानता हूं कि एक व्यक्ति जो किसी अन्य प्रकार से शोषण करता है वही
वह व्यक्ति है जो दूसरे रूप में इस प्रकार से लोगों की कमजोरियों को लोगों की मानसिक कमजोरियों को भना करके स्वयं के स्वार्थ की सिद्धि करता है। इसमें मेरा कहना है कि ना तो कहीं धर्म है और ना ही कहीं आध्यात्म है और ना ही किसी प्रकार से किसी की मुक्ति का कोई मार्ग मिलता है। मुक्ति के लिए हमारे यहां तरीके बताए हुए हैं। जो चार मोक्ष के मार्ग हैं जिनसे हम मोक्ष पे पहुंचते हैं उनका पालन करना चाहिए। अपना ज्ञान बढ़ाना चाहिए और जहां तक शासन का संदर्भ है, जहां तक शासन की बात है, शासन को निश्चित रूप से इस पर किसी प्रकार से नियंत्रण करते हुए वैसे मैं मानता हूं कि कोई भी शासन जो लोकतंत्र में रह रहा है और जिसे वोटों की आवश्यकता है। आजकल धर्म को भुलाने का हर जगह काम चल रहा है। और धर्म ही यहां के मनुष्य की सब में बड़ी कमजोरी है। और उसे धर्म नहीं कहा जाए। एक प्रकार की परंपरा या एक प्रकार के पाखंड कह लिया जाए। उसके माध्यम से ही सारा हमारे यहां धर्म हो रहा है और यह लोग धर्म को सर्वाधिक नुकसान पहुंचाने वाले लोग हैं जो इस प्रकार के आडंबर करें।
...जो मौत पर भी नाच रहा हो वो साधु हो ही नहीं सकता
जहां तक सवाल है कि कल सीहोर में हुए हादसे के बाद मैं सोचता हूं ऐसा कोई मनुष्य नहीं हो सकता है कि जो आपके समारोह में आए हुए लोगों की मृत्यु हो जाए। अव्यवस्था हो जाए। दूसरे लोगों को परेशानी हो रही है और आप नृत्य कर उनकी डेथ बॉडी घर तक नहीं पहुंची अभी। हां। ऐसी स्थिति में अगर कोई मनुष्य नृत्य करता है मनुष्य जो साधु होगा, वो दूसरे की पीड़ा को जब तक अनुभव नहीं करेगा, तब तक वो साधु स्वभाव हो ही नहीं सकता है। वो एक पाखंडी हो सकता है। वो किसी भी रूप में अपने हितों के लिए मनुष्य की कमजोरियों को बनाने वाला व्यक्ति हो सकता है।

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