संसद सत्र के पहले दिन दिल्ली में भारी बवाल: सोनम वांगचुक और युवाओं के आंदोलन के आगे झुकी सरकार
नई दिल्ली, सबकी खबर।
देश की राजधानी दिल्ली आज एक बार फिर बड़े आंदोलन का गवाह बनी। शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और रोजगार के मुद्दे पर देश भर से आए युवाओं के उग्र प्रदर्शन और पर्यावरणविद सोनम वांगचुक के आमरण अनशन ने सरकार को बैकफुट पर धकेल दिया है। संसद सत्र के पहले दिन जंतर-मंतर से संसद मार्च के दौरान हुए भारी हंगामे और लाठीचार्ज के बाद आखिरकार सरकार ने प्रदर्शनकारियों के लिए बातचीत के दरवाजे खोल दिए हैं। संसद सत्र के पहले दिन अपनी आवाज बुलंद करने के लिए देश भर से हजारों युवा दिल्ली पहुंचे। जब युवाओं ने जंतर-मंतर से संसद की ओर कूच करने का प्रयास किया, तो पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए भारी बैरिकेडिंग की। आंदोलनकारियों का आरोप है कि पुलिस ने प्रदर्शन को कुचलने के लिए लाठीचार्ज किया, जिसमें कई युवाओं को चोटें आईं। प्रदर्शन के दौरान युवाओं ने हिंसा का रास्ता न चुनकर गांधीवादी तरीका अपनाया। लाठियां खाने के बावजूद युवा पीछे नहीं हटे और पुलिस के सामने हाथ नीचे करके शांतिपूर्ण ढंग से डटे रहे।प्रदर्शनकारियों के बीच यह चर्चा और आक्रोश का विषय रहा कि प्रदर्शन स्थल के पास पुलिस की गाड़ियों में कथित तौर पर पत्थर भरे हुए थे, जिसे लेकर युवाओं में भारी नाराजगी देखी गई।
सरकार ने खोले बातचीत के रास्ते: जेपी नड्डा संभाल रहे हैं कमान
आंदोलन के देशव्यापी रूप लेने के डर से सरकार ने तत्काल कदम उठाए हैं। मिली जानकारी के अनुसार, सरकार की ओर से बातचीत की पहल की गई है। आंदोलन के प्रतिनिधि सौरभ दास को पुलिस सुरक्षा में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के पास बातचीत के लिए ले जाया गया है। फिलहाल दोनों पक्षों के बीच वार्ता जारी है और इसके परिणामों का इंतजार है। जंतर-मंतर पर चल रहे इस युवा आंदोलन को धार देने के लिए आज विपक्ष के कई दिग्गज नेता भी मैदान में उतरे। विपक्षी नेताओं ने सरकार पर युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने और लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने का आरोप लगाया।
सोनम वांगचुक का अस्पताल से संदेश: "यह दूसरा स्वतंत्रता आंदोलन है"
पिछले 28 जून से आमरण अनशन पर बैठे देश के प्रख्यात वैज्ञानिक और आंदोलनकारी सोनम वांगचुक को 18 जुलाई को जबरन अनशन स्थल से उठाकर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 20 जुलाई को अस्पताल से ही उन्होंने देश के नाम संदेश भेजकर कहा कि "20 जुलाई को भारत के दूसरे स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत माना जाए।" उन्होंने डॉक्टरों को पत्र लिखकर संसद मार्च में शामिल होने की अनुमति भी मांगी थी, जिसे खारिज कर दिया गया। अस्पताल में होने के बावजूद उन्होंने अन्न का त्याग कर रखा है।
युवाओं के आक्रोश के मुख्य कारण
इस ऐतिहासिक प्रदर्शन के पीछे देश के युवाओं की गहरी हताशा और व्यवस्था के प्रति नाराजगी है। हाल के दिनों में हुए लगातार पेपर लीक और परीक्षाओं के रद्द होने से देश के करोड़ों युवाओं का भविष्य अधर में लटक गया है। देश में रोजगार के अवसर न मिलने के कारण युवा विदेशों का रुख कर रहे हैं, जहां से हाल ही में अमेरिका द्वारा कई भारतीय युवाओं को हथकड़ी लगाकर डिपोर्ट (वापस) किए जाने की खबरें सामने आई हैं। युवाओं का कहना है कि सरकार शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से अपनी मांग रख रहे प्रदर्शनकारियों को लाठियों के दम पर दबाना चाहती है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
सरकार के लिए बड़ी चेतावनी
दिल्ली में युवाओं का यह सैलाब इस बात का संकेत है कि यदि सरकार ने बातचीत के जरिए कोई ठोस और सकारात्मक समाधान नहीं निकाला, तो यह आंदोलन पूरे देश में फैल सकता है। जानकारों का मानना है कि श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में हुए हालिया जन-आक्रोश से सीख लेते हुए सरकार को युवाओं की मांगों पर संवेदनशीलता से विचार करना होगा।

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