जबलपुर । 
 जबलपुर स्थित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय की स्थापना 1956 में हुई थी. स्थापना के समय रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय को 100 एकड़ जमीन दी गई थी. यह मध्य प्रदेश का बड़ा विश्वविद्यालय रहा है. जबलपुर, नरसिंहपुर, कटनी, डिंडोरी, उमरिया, मंडला, बालाघाट, छिंदवाड़ा, शहडोल जैसे कई जिले जबलपुर की रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से ही मान्यता लेकर अपने कॉलेज चलाते रहे हैं.
एक समय छात्रों की संख्या 2 लाख थी
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के अतिथि शिक्षक अजय मिश्रा ने बताया "रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में यूजीसी ने157 पद स्वीकृत किए थे. इसमें प्राध्यापक, सहायक प्राध्यापक, लेक्चरर के पद थे. एक समय पर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से संबंध कॉलेजों में लगभग 2 लाख छात्र पढ़ा करते थे. विश्वविद्यालय में 29 विभाग थे. इन सभी विभागों की अपनी अपनी इमारतें हैं. इनमें पढ़ाई के साथ शोध हुआ करता था.
विश्वविद्यालय में मात्र 15 प्रोफेसर बचे
आज के हालात बहुत खराब हैं. रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में मात्र 15 लेक्चर प्रोफेसर बचे हैं. इनमें से भी एक प्रोफेसर निलंबित है. एक छुट्टी लेकर विदेश गए हुए हैं. कुल मिलाकर 13 लेक्चरार और प्रोफेसर के भरोसे रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में पढ़ाई चल रही है. इनमें से भी बहुत से प्रोफेसर रिटायरमेंट के करीब हैं. यूनिवर्सिटी में शोध का काम लगभग बंद है. जहां कभी 2 लाख से ज्यादा बच्चे पढ़ा करते थे, वहां अब मात्र 48 हजार छात्र-छात्राओं का ही यूनिवर्सिटी में रजिस्ट्रेशन है.
अतिथि विद्वानों के भरोसे विश्वविद्यालय
यहां तक कि यूनिवर्सिटी टीचिंग डिपार्टमेंट में एचओडी तक अलग-अलग नहीं है. एक प्रोफेसर के पास 12 विभागों का चार्ज है. योग और विज्ञान विषय में तो कोई एचओडी बनने तक को तैयार नहीं है. अलग-अलग विभागों में 100 अतिथि शिक्षक हैं. इन्हीं के भरोसे यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करवाई जा रही है.
कुलपति बोले- पूरे प्रदेश में यही स्थिति
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर डॉ राजेश वर्मा का कहना है "राज्य सरकार यूनिवर्सिटी की स्थिति से भलीभांति परिचित है. यह स्थिति केवल जबलपुर की नहीं है बल्कि पूरे प्रदेश में हालात कुछ इसी तरह के हैं. इसीलिए राज्य सरकार ने एक कमेटी बनाई है, जो उच्च शिक्षा को बेहतर करने के लिए सुझाव दे रही है. रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में जल्द ही लेक्चर और प्रोफेसर की भर्ती निकाली जाएंगी. इसके लिए रोस्टर तैयार किया जा रहा है."
हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय की स्थिति अलग
हालांकि सागर के हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय के हालात मध्य प्रदेश की दूसरे विश्वविद्यालय से काफी बेहतर है. इस पर प्रोफेसर राजेश वर्मा का कहना है "सागर का हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय केंद्रीय यूनिवर्सिटी है और उनका साल भर का बजट ही 300 करोड़ के लगभग है. वहीं दूसरी तरफ राज्य सरकार की यूनिवर्सिटी को मात्र 7 करोड़ करोड़ रुपये ही सरकार से मिलते हैं. ऐसी स्थिति में हमारा ज्यादातर काम छात्रों से मिलने वाली फीस से ही चलता है."
कर्मचारी हड़ताल पर, पेंशन नहीं मिलने का आरोप
विश्वविद्यालय पहले ही संकट में है. दूसरी तरफ विश्वविद्यालय के कर्मचारी हड़ताल पर बैठे हैं. कर्मचारियों का कहना है कि हमारे कई कर्मचारी रिटायर हो गए हैं लेकिन उन्हें पेंशन नहीं मिल रही है. कर्मचारी संगठन के महासचिव राजेंद्र प्रसाद शुक्ल ने बताया "यूनिवर्सिटी के कुलपति और कुलसचिव मुद्दे को हल नहीं कर पा रहे हैं.
बदतर हालात पर पूर्व छात्र नेता ने जताई चिंता
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में लंबे समय तक छात्र राजनीति करने वाले नेता आलोक मिश्रा ने आरोप लगाया "एक तरफ निजी विश्वविद्यालय खुलते जा रहे हैं. उन्हें सरकार का पूरा समर्थन है. दूसरी तरफ ऐसी संस्थाएं जहां कम पैसे में गरीब परिवार के बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करते थे, उन संस्थाओं को जानबूझकर बर्बाद करने की कोशिश की जा रही है. यदि यही हालात रहे तो वह दिन दूर नहीं जब रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में ताला लग जाएगा."
टेक्निकल कोर्स शुरू करने होंगे
शिक्षा की जानकार लोगों का कहना है कि यूनिवर्सिटी बीए-बीकॉम जैसे कोर्स चलाती है. इन कोर्स को करने के बाद किसी को नौकरी नहीं मिलती. इसलिए इन कोर्सों की प्रासंगिकता ही खत्म हो गई है. तकनीकी कोर्स या तो निजी विश्वविद्यालय के पास हैं या उनकी अपनी यूनिवर्सिटी हैं. इसलिए परंपरागत कोर्स चलाने वाले विश्वविद्यालय तो किसी दिन बंद हो ही जाएंगे. वहीं निजी विश्वविद्यालय में परीक्षाएं समय पर होती हैं. हड़ताल नहीं होती. गड़बड़ घोटाले नहीं होते. इसलिए ज्यादातर छात्र निजी विश्वविद्यालय में पढ़ना पसंद करते हैं.