जबलपुर। 
संवेदनशीलता जब मर जाती है, तो सिस्टम 'जले पर नमक' छिड़कने का काम करने लगता है। जबलपुर के बरगी जलाशय में हुए भीषण क्रूज हादसे ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया, जिसमें 13 मासूम जिंदगियां काल के गाल में समा गईं। लेकिन इस मातम के बीच जबलपुर कलेक्टर राघवेंद्र सिंह की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने जनता के गुस्से को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है।
हादसे में 'सफलता' का जश्न?
हादसे के बाद जब रेस्क्यू टीम ने पानी से दो बच्चों के शव बरामद किए, तो कलेक्टर साहब ने इसे दुखद घटना बताने के बजाय सोशल मीडिया पर अपनी 'सफलता' करार दे दिया। उन्होंने लिखा— "सर्च ऑपरेशन में दो बच्चों के शव बरामद करने में मिली सफलता।" सवाल यह उठता है कि क्या 13 लोगों की जान जाना प्रशासन की विफलता नहीं है? क्या उजड़े हुए पिताओं और बिलखती माताओं के सामने बच्चों की लाशें निकालना किसी अधिकारी के लिए 'अचीवमेंट' हो सकता है? चौतरफा थू-थू होने के बाद कलेक्टर ने पोस्ट तो हटा ली, लेकिन उनकी इस शब्दावली ने यह साफ कर दिया कि फाइलों और किताबों में रमी रहने वाली अफसरशाही जमीनी दर्द से कितनी दूर है।
असफलता पर 'कुंडली' मारकर बैठे हैं साहब!
एक तरफ लाशें निकालने को सफलता बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ असली चुनौतियों पर चुप्पी छाई है। भाजपा विधायक संजय पाठक की खदानों पर 443 करोड़ रुपये की अवैध माइनिंग की वसूली का मामला विधानसभा तक गूंज चुका है। मुख्यमंत्री खुद इसकी पुष्टि कर चुके हैं, लेकिन खबर है कि कलेक्टर साहब इस फाइल पर 'कुंडली' मारकर बैठे हैं। आखिर वसूली में देरी किसकी शह पर हो रही है? क्या रसूखदारों से पैसा वसूलने में कलेक्टर अपनी 'असफलता' को भी सोशल मीडिया पर स्वीकार करेंगे?
सिस्टम की साख पर सवाल
हादसे के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करने के बजाय, शव मिलने पर खुद की पीठ थपथपाना 'मानवता' का अपमान है। 2013 बैच के आईएएस राघवेंद्र सिंह, जो खुद को लेखक भी बताते हैं, क्या अपनी किसी किताब में यह भी लिखेंगे कि मौतों के बीच 'सफलता' कैसे ढूंढी जाती है?  जनता पूछ रही है कि साहब! जिस दिन आप संजय पाठक से 443 करोड़ वसूल लेंगे और जिले में हादसों को शून्य कर देंगे, क्या उस दिन अपनी हार का ठीकरा खुद पर फोड़ेंगे? या फिर सफलता का श्रेय लेने की यह भूख मासूमों की चीखों से भी ऊपर रहेगी?