भोपाल/इंदौर।
मध्य प्रदेश इस समय भीषण और ऐतिहासिक जल संकट के दौर से गुजर रहा है। सूबे के 14 से अधिक जिलों में हाहाकार मचा है और जनता एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रही है। लेकिन इस आपदा के बीच मध्य प्रदेश के आला अधिकारी सिर्फ 'बैठक-बैठक' खेलने में व्यस्त हैं। मुख्यमंत्री के निर्देश पर मुख्य सचिव ने संभाग आयुक्तों और कलेक्टरों की मैराथन बैठकें लीं, कलेक्टरों ने जिला पंचायत के सीईओ से कॉन्फ्रेंसिंग की, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन सरकारी समीक्षा बैठकों से जनता के हलक के लिए पानी की एक बूंद भी नहीं निकल पा रही है।
कागजी आंकड़ों का फर्जीवाड़ा: कहाँ गए ₹20,763 करोड़?
लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में नल-जल योजना के नाम पर अब तक ₹20,763 करोड़ का भारी-भरकम बजट पानी की तरह बहाया जा चुका है। दावों में कहा गया है कि राज्य के 1 करोड़ 11 लाख घरों में पानी पहुंचाने के लक्ष्य के मुकाबले 79 लाख से अधिक ग्रामीण घरों में नल से शुद्ध जल पहुंच रहा है। लेकिन धरातल पर सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। गांवों और शहरों में पाइपलाइनें टूटी पड़ी हैं, नल सूखे हैं और नल-जल योजना मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा स्मारक बन चुकी है। जब संकट सिर के ऊपर आ गया, तब मई के अंतिम सप्ताह में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ₹1500 करोड़ की राशि जारी की जा रही है, जो अधिकारियों की घोर लापरवाही और दूरदर्शिता की कमी को उजागर करता है।
पुलिस अफसर के पैरों में लेटे पार्षद, जनता पर फेंका जा रहा पानी
जल संकट की सबसे वीभत्स और विचलित करने वाली तस्वीर सूबे की आर्थिक राजधानी इंदौर के भागीरथपुरा से सामने आई है। यहाँ पानी की किल्लत को लेकर जब स्थानीय पार्षद और रहवासी सड़क पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने उतरे, तो प्रशासनिक संवेदनहीनता की हद पार हो गई। जनता को पीने का पानी देने के बजाय पुलिस बल वॉटर कैनन (पानी की गाड़ियां) लेकर पहुंच गया और प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने के लिए उन पर पानी की बौछारें मारी गईं। इस दौरान एक बेहद मार्मिक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें बेबस पार्षद और रोते-बिलखते लोग एडिशनल एसपी और एसीपी के पैरों में गिरकर चीखते नजर आए—"साहब, हमें भले मार लो, हम पर यह पानी फेंक दो, लेकिन हमारी प्यासी जनता को पीने का पानी दे दो!"
नेताओं की लाचारी: भोपाल से फोन आते ही सरेंडर हुए BJP विधायक
पानी की इस किल्लत ने सत्ताधारी दल के भीतर के असंतोष को भी उजागर कर दिया है। इंदौर के वरिष्ठ भाजपा विधायक महेंद्र हार्डिया ने पहली बार हिम्मत दिखाते हुए सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उनके क्षेत्र में नर्मदा का पानी नहीं पहुंचा है और लोग बूंद-बूंद को तरस रहे हैं। उन्होंने साफ कहा था कि वे चुप नहीं बैठेंगे। लेकिन सूत्रों के मुताबिक, भोपाल बैठे आकाओं से 'अगला टिकट कटने' की जैसे ही धमकी भरी डांट पड़ी, विधायक बैकफुट पर आ गए। अगले ही दिन विधायक जी ने महापौर के गले मिलते हुए फोटो सोशल मीडिया पर डालकर घुटने टेक दिए, जिसने राजनीतिक ड्रामेबाजी को सरेआम बेनकाब कर दिया।
इन 14 जिलों में मची है सबसे बड़ी त्राहि-त्राहि
गूगल और जमीनी रिपोर्ट से सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश के ये जिले इस समय पानी के सबसे भयंकर अकाल से जूझ रहे हैं: इंदौर, भोपाल, जबलपुर, सागर, छतरपुर, टीकमगढ़, रीवा, सतना, मुरैना, शिवपुरी, खरगोन, बड़वानी, धार और मुख्यमंत्री का गृह जिला उज्जैन।
इन क्षेत्रों में जो सरकारी टैंकर भेजे भी जा रहे हैं, उन पर रसूखदार पार्षदों, विधायकों और स्थानीय नेताओं का कब्जा है। आम जनता का नंबर तब आता है जब इन वीआईपी लोगों की टंकियां भर जाती हैं। हद तो यह है कि कई जगह पानी की टंकियां तो खड़ी कर दी गईं, लेकिन वहाँ बिजली का कनेक्शन तक नहीं है।
विपक्ष और मीडिया का सवाल: कब पकड़ी जाएगी नकारा अफसरों की गर्दन?
यह संकट प्राकृतिक से ज्यादा प्रशासनिक विफलता का नतीजा है। पढ़े-लिखे और एयर कंडीशनर कमरों में बैठने वाले अधिकारियों को पहले से अंदाजा क्यों नहीं था कि मई-जून में वाटर लेवल कहाँ जाएगा? आज देश की आजादी के इतने सालों बाद भी 8-9 साल के मासूम बच्चे कुओं से पानी खींचने को मजबूर हैं। पत्रकारिता के धर्म का निर्वहन करते हुए सरकार से सीधा सवाल है कि करोड़ों का बजट डकारने वाले इन असफल और नकारा अधिकारियों को जेल कब भेजा जाएगा? यदि व्यवस्था में चूक हुई है, तो सरकार को जनता से हाथ जोड़कर माफी मांगनी चाहिए और अगले 15 दिनों के संकट को काटने के साथ-साथ अगले 15 सालों के लिए पानी का ठोस ब्लूप्रिंट तैयार करना चाहिए।