इंदौर। 
इंदौर में दूषित पानी पीने से 15 लोगों की मौत के बाद मध्यप्रदेश की जल आपूर्ति व्यवस्था एक बार फिर कठघरे में है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस मामले को लेकर सरकार पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि इंदौर और भोपाल में गंदे पानी की सप्लाई को लेकर भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने 2019 में ही गंभीर चेतावनी दी थी, लेकिन सरकार ने न रिपोर्ट को गंभीरता से लिया और न ही सुधार किए। उमंग सिंघार ने ट्वीट कर कहा कि गंदे पानी की वजह से जानें जाना किसी हादसे का नतीजा नहीं, बल्कि सरकारी लापरवाही और भ्रष्टाचार का परिणाम है।
ADB से कर्ज, फिर भी साफ पानी नसीब नहीं
नेता प्रतिपक्ष ने याद दिलाया कि मध्यप्रदेश सरकार ने वर्ष 2004 में एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) से भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर के जल प्रबंधन के लिए 200 मिलियन डॉलर (तब करीब 906 करोड़ रुपये) का कर्ज लिया था। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य हर नागरिक को पर्याप्त और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना था। लेकिन कर्ज लेने के करीब 15 साल बाद 2019 में आई CAG रिपोर्ट ने इस पूरे प्रोजेक्ट को असफल और भ्रष्टाचार से ग्रस्त बताया।
कैग (CAG) रिपोर्ट, सिस्टम फेल होने की कहानी
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि CAG की रिपोर्ट के मुताबिक इंदौर में केवल 4 जोन और भोपाल में सिर्फ 5 जोन में रोज पानी की सप्लाई हो रही थी।दोनों शहरों के 9.41 लाख परिवारों में से महज 5.30 लाख को ही नल कनेक्शन मिल सके। इपलाइन लीकेज की शिकायतों पर नगर निगम 22 से 182 दिन तक लगाता रहा। 2013 से 2018 के बीच लिए गए 4,481 पानी के नमूने पीने योग्य नहीं पाए गए, लेकिन इन पर की गई कार्रवाई का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।
लाखों लोगों तक पहुंचा गंदा पानी
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि CAG की स्वतंत्र जांच में 54 में से 10 पानी के नमूने दूषित पाए गए, जिनमें गंदगी और मल कोलिफॉर्म बैक्टीरिया मौजूद था। इसके चलते भोपाल के 3.62 लाख और इंदौर के 5.33 लाख कुल 8.95 लाख लोगों को गंदा पानी सप्लाई हुआ। इसी अवधि में स्वास्थ्य विभाग ने 5.45 लाख जलजनित बीमारियों के मामले दर्ज किए।
पानी गायब, जवाबदेही नदारद
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि गैर-राजस्व पानी (Non-Revenue Water) 30 से 70 प्रतिशत तक है, यानी इतना पानी कहां जा रहा है—किसी को पता नहीं। नियमित जल ऑडिट नहीं होने से बर्बादी और चोरी पर लगाम नहीं लग पाई। इसके अलावा दोनों शहरों में पानी के टैरिफ की वसूली भी नहीं हो सकी और नगर निगम पर 470 करोड़ रुपये का बकाया चढ़ गया।