ग्वालियर।
कल्पना कीजिए 104 एकड़ में फैले एशिया के सबसे बड़े मेलों में से एक, जहां हजारों की भीड़ है और अचानक एक 5 साल का बच्चा अपनों से बिछड़ जाए। उस वक्त दहशत में डूबे माता-पिता के लिए एलएस अजनेरिया की आवाज़ किसी देवदूत की पुकार जैसी लगती है। 1905 में शुरू हुए ग्वालियर व्यापार मेले में अजनेरिया पिछले 5 दशक से रेडियो रूम की कमान संभाले हुए हैं। वे बताते हैं कि हर दिन करीब 20 से 30 परिवार अपनों को ढूंढते हुए उन तक पहुंचते हैं। आज के डिजिटल युग में जहां सब कुछ बदल गया, अजनेरिया जी का जज्बात भरा अनाउंसमेंट और लोगों की आंखों से छलकते खुशी के आंसू आज भी इस ऐतिहासिक मेले की सबसे खूबसूरत हकीकत हैं।
मेले की पहचान बनी आवाज
ग्वालियर मेला में घूमने आने वाले सैलानी कई बार संकट में पड़ जाते हैं। मेले में आए बच्चे या बुजुर्ग बिछड़ जाते हैं, तो कभी कीमती सामान गुम हो जाता है। ऐसी स्थिति में सबसे पहले परेशान व्यक्ति पुलिस या मेला के रेडियो रूम पहुंचता है। आज की मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में भी ग्वालियर व्यापार मेले में उनकी आवाज गूंजती है और लोगों की मदद करती है। उनकी आवाज अब ग्वालियर मेले की पहचान बन चुकी है। मेले के रेडियो सेक्शन में हर दिन 20 से 30 परिवार पहुंचते हैं। यहां रेडियो रूम में बैठे एलएस अजनेरिया माइक पर एनाउंसमेंट करते हैं।
रोते हुए आते हैं लोग, हंसते हुए जाते हैं
अजनेरिया ने बताया कि रोजाना 25 से 30 परिवार तो आते ही हैं लेकिन कभी भीड़ ज्यादा हो तो यह आंकड़ा 50 भी पार कर जाता है। लोग रोते हुए आते हैं और हंसते हुए जाते हैं। किसी के बिछड़ने का गम भी होता है और उसके मिलने की खुशी भी होती है जो यहां आने वाले लोगों के चेहरे पर साफ दिखाई देती है। उन्होंने बताया कि यह दो माह जो मेला लगता है तो इसमें इसलिए आते हैं ताकि लोगों से मिल सके लोगों से मिलने के बाद ही उनकी साल भर की थकान दूर हो जाती है।
चुनाव प्रचार में भी देते हैं आवाज
उन्होंने बताया कि मेले के अलावा भी वह चुनाव प्रचार वगैरह के लिए अपनी आवाज देते हैं उनकी आवाज को लेकर लोग काफी उत्साही रहते हैं। अजनेरिया ने बताया कि व्यापार मेले में मुझे हर व्यापारी जानता है। मेला जैसे-जैसे अपने रंग पर आता है, व्यापारी आते हैं और उनसे मिलते हैं। लोग जब बिछड़ते हैं तो यहां रेडियो रूम पर रोते हुए आते हैं लेकिन जब लोग अपनों से मिल लेते हैं और जब मैं अनाउंसमेंट करता हूं मेले में सभी अलर्ट मोड पर आ जाते हैं। ऐसे में कई बार मैं रेडियो रूम में अंदर होता हूं तो लोग मुझे नहीं मिल पाते। जब कुछ लोग जिद भी करते हैं तो आकर उनसे मुलाकात करता हूं, उनके आंखों से निकलने वाले आंसू और उनके जज्बात जिस तरह से मुझे धन्यवाद देते हैं, वह काफी अच्छा लगता है।