भोपाल, सबकी खबर। 
राजधानी भोपाल में पश्चिमी बाईपास बनाने का जो मामला है जो पिछले दो साल से अटका हुआ था उसे ग्रीन सिग्नल दे दिया गया है। अब इस रोड को क्यों बनाया जा रहा है? किसके लाभ के लिए बनाया जा रहा है? इससे किसे फायदा होगा और किसे नुकसान होगा? यह एक लंबा विषय हैं लेकिन आखिर इस बाईपास की कीतनी जरूरत थी ​और इस बाईपास के बनने से सरकार को क्या लाभ होगा ये समझने वाली बात है। मामला दरअसल यह हैं कि इंदौर से जबलपुर जाने वाला जो मार्ग है उसके लिए भोपाल से बाहर जाने के लिए पूर्वी बाईपास बना हुआ है। यदि आप इंदौर से भोपाल की ओर आते हैं तो खजूरी के आगे लेफ्ट में एक रास्ता मुड़ता है कोलूखेड़ी के बगल से। यह रास्ता लगभग 50 कि.मी. का सफर करते हुए यह उसी रतनपुर में जाके मिल जाता है जहां से नया पश्चिमी बाईपास बनाने की अभी मुहिम चल रही है। और यह जो बाईपास बना हुआ है पूर्वी बाईपास बड़ा अच्छा बाईपास है। चौड़ा है और बहुत ज्यादा ट्रैफिक भी नहीं है इस पर। सबसे बड़ी बात यह है कि जब आप मुड़ते हैं तो आपको मुख्य शहरों के लिए प्रॉपर कनेक्टिविटी मिलती है। यानी पूर्वी रोड हमारा काफी अच्छा है। चौड़ा रोड है। बहुत क्वालिटी का बना हुआ है। यदि सरकार को चाहिए तो आगे जाके इसे सिक्स लेन भी किया जा सकता है। लेकिन अब केवल इसी रोड को कनेक्ट करने के लिए एक नया रोड प्रस्तावित किया गया है। और वो रोड बनाया गया है पश्चिमी बाईपास। लेकिन पश्चिमी बाईपास के कितने नुकसान हैं ओर कितने फायदे हैं यह समझने वाली बात है । यह जो पश्चिमी बाईपास शुरू होगा रतनपुर से वही भोजपुर चौराहे के पास से और यह नीलबड़ से होते हुए सारे जंगलों में होता हुआ पूरे हरियाली के बीच से हमारी वाटर बॉडीज को पार करता हुआ फंदा पे जाकर मिलेगा यह लगभग 35 किमी का बाईपास बनाया जा रहा है। इसकी कॉस्ट लगभग 3000 करोड़ है। इस 3000 करोड़ में से 470 करोड़ भूमि अधिग्रण में खर्च किए जाएंगे। 557 एकड़ भूमि वहां अधिग्रहित की जानी है। 
जंगल से लेकर छोटी छोटी नदियां हो जाएगी खतम
इसे लेकर पर्यावरणविद अजय दुबे ने बताया अब इसका नुकसान यह है कि यहां पर ये जो पूरा पश्चिमी इलाका है यह लगभग 25 गांवों से होकर गुजरेगा। बहुत बडा जंगल का भूभाग और बाघ विचरण क्षेत्र वाला एरिया इसकी जद में आएगा और इसके अलावा भोपाल की जितनी भी वाटर बॉडीज हैं बड़ा तालाब हो, कलियासोत हो या कोलार हो, केरवा से लेकर इनकी छोटी छोटी सहायक नदियां इसकी जद में आ जाएगी। कुल मिलाकर इस बाईपास के बनने से पर्यावरण को एक बडी क्षति पहुंचाई जाएगी। 
रसूखदारों के फायदे के लिए बनाया जा रहा है विनाशकारी बाईपास
मध्य प्रदेश सरकार के बजट में कर्जे की बात आती है और आज जब हम इस प्रोजेक्ट पर बात कर रहे हैं तो यह जरूरत नहीं है। यह वहां के जो रसूखदार जिनकी जमीन है जो लोग मध्य प्रदेश सरकार में निर्णय बनाते हैं, बिगाड़ते हैं। अधिकारी, नेता, मंत्री जो भी प्रभावशाली लोगों की जमीन है उन लोगों के फायदे के लिए, उनके जमीन की कीमत के लिए इस तरह का प्रकृति के साथ अन्याय हो रहा है और निश्चित तौर पर जब आंकड़े बाहर आएंगे और पहले भी जानकारी बाहर आई है कि इंपॉर्टेंट ऑफिसर्स हैं प्रभावशाली ये उनकी मनमर्जी है और विनाशकारी प्रोजेक्ट के लिए। इस बाईपास का निर्माण किया जा रहा हैं। पर्यावरण और जंगलों को प्रति सुप्रीम कोर्ट बेहद संवेदनशील है। पर्यावरणीय हानि होती हैं तो इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएंगे। बुनियादी चीजों के लिए नहीं हैं सरकार के पास पैसा जनता के लिए जरूरी अत्यंत जरूरी आवश्यकता नहीं है। ऐसे कितनी सड़कें गांव में आप देखिए बच्चे नाले को क्रॉस कर रहे हैं।मतलब बाढ़ में किस तरह स्कूल जाते हैं। क्या इतना पैसा हम जनता की मूलभूत सुविधाओं के लिए खर्च नहीं कर सकते? यहांजब हमारे पास विकल्प है रोड का लोगों के आवागमन के लिए विकल्प है। 
तो सुप्रीम कोर्ट में देंगे चुनौती ... 
यह कोई बहुत  जरूरी प्रोजेक्ट नहीं है। यदि मुख्यमंत्रीजी ने 2 साल से इसको रोका है तो निश्चित तौर पर यह अर्जेंसी या टॉप प्रायोरिटी का प्रोजेक्ट नहीं है। और जब टाइगर्स मूवमेंट होती है, मुख्यमंत्री वाइल्ड लाइफ को पसंद करते हैं, उनके लिए सेंचुरी और टाइगर्स के निर्माण में वह आगे आ रहे हैं। क्या यह संभव है कि जो मुख्यमंत्री जंगलों को संरक्षण देते हैं, उनकेकार्यकाल में बाघों के घर को उजाड़ के और करोड़ों के प्रोजेक्ट को बनाया जाएगा?  निश्चित तौर पर यह गलत है और यह प्राथमिकता का विषय नहीं है। इस पैसे को जनता के अन्य सुविधाओं में जो दूरस्थ अंचल है, जहां पुल की जरूरत है, सड़क की जरूरत है, वहां खर्च किया जाए। मध्य प्रदेश सरकार तत्काल इस प्रोजेक्ट को रोके और यदि यह प्रोजेक्ट आगे ग्रीन सिग्नल मिलता है तो हम इसको सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे ।