भोपाल, सबकी खबर।
देश में जहां एक तरफ शिक्षा व्यवस्था और परीक्षाओं को लेकर युवा सड़कों पर आक्रोशित हैं, वहीं मध्य प्रदेश में स्कूली शिक्षा विभाग एक के बाद एक बड़े विवादों के घेरे में आता जा रहा है। मध्य प्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार में स्कूली शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह के विभाग पर अब बच्चों के निवाले और बजट पर 'डाका' डालने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। 'सबकी खबर' के के हाथ लगे पुख्ता दस्तावेजों से यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि शिक्षा विभाग ₹2.5 लाख में मिलने वाली चपाती (रोटी) बनाने वाली मशीन को ₹7.74 लाख की भारी-भरकम दर पर खरीदने की पूरी तैयारी कर चुका है। स्कूली शिक्षा विभाग के अंतर्गत वर्तमान में किचन के बर्तनों और उपकरणों की खरीदी के लिए एक बड़ा टेंडर जारी किया गया है, जिसमें 116 चपाती (रोटी) मशीनें मांगी गई हैं। मशीन की क्षमता 1 घंटे में 1,000 रोटी बनाने की है। बाजार और बड़ी निर्माता कंपनियों के अनुसार, सभी टैक्स मिलाकर इस क्षमता की सबसे बेहतरीन मशीन की अधिकतम कीमत ₹2.25 लाख से ₹2.50 लाख तक होती है। लेकिन शिक्षा विभाग के टेंडर में जो दरें सामने आई हैं, वो होश उड़ाने वाली हैं। इसमें न्यूनतम बोलीदाता यानी L-1 कंपनी आर्थव एंटरप्राइजेज (देहरादून) ने ₹7,74,842.28 प्रति मशीन की दर दी है, जबकि L-2 और L-3 की दरें तो क्रमशः 13.59 लाख और 14.36 लाख रुपये तक पहुंच गई हैं। बड़ा सवाल यह है कि जब बाजार में यह मशीन ढाई लाख रुपये में उपलब्ध है, तो पौने आठ लाख रुपये प्रति मशीन के हिसाब से भुगतान करने की तैयारी क्यों की जा रही है? प्रति मशीन ₹5 लाख से अधिक की यह अतिरिक्त राशि किसकी जेब में जाने वाली है? शिक्षा विभाग के इन दावों की पोल खुद मध्य प्रदेश सरकार का ही दूसरा विभाग खोल रहा है। आदिम जाति कल्याण विभाग ने हाल ही में जैम (GeM - Government e-Marketplace) पोर्टल के जरिए अलग-अलग स्थानों के लिए 80 चपाती मशीनें खरीदी हैं। आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, जैम पोर्टल के जरिए खरीदी गई उन सभी 80 मशीनों की कीमत जीएसटी (GST) मिलाकर ₹2,44,000 से ₹2,45,000 के बीच पड़ी है। ऐसे में शिक्षा मंत्री और उनके अधिकारियों को जवाब देना चाहिए कि उनके विभाग की मशीन में ऐसा कौन सा सोना या हीरा जड़ा है जो उसकी कीमत ₹7.74 लाख हो गई? इस पूरे खेल के पीछे का प्रशासनिक ढांचा भी बड़े सवालों के घेरे में है। सूत्रों और दस्तावेजों के अनुसार, शिक्षा मंत्री के प्रभाव में मध्य प्रदेश पाठ्य पुस्तक निगम में एक चहेते अधिकारी को प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर लाया गया है। भोपाल के एमएलबी कॉलेज में रसायन शास्त्र (Chemistry) के प्राध्यापक अरुण सिंह को दो साल के लिए प्रतिनियुक्ति पर लाकर पाठ्य पुस्तक निगम के सभी टेंडरों का टेक्नीकल हेड (Technical Head) बना दिया गया है। अब जनता यह पूछ रही है कि रसायन विज्ञान के एक प्रोफेसर साहब स्कूली बच्चों के कपड़ों (गणवेश) की क्वालिटी, बर्तनों के स्टील और चपाती मशीन के मैकेनिकल टेंडर के 'टेक्नीकल एडवाइजर' कैसे बन गए? क्या इसी साठगांठ के लिए उन्हें लाया गया था? यह कोई पहला मामला नहीं है। जून महीने में सरकार ने प्रदेश के 52 लाख बच्चों को दो-दो सिली-सिलाई ड्रेस (गणवेश) मुफ्त देने का निर्णय लिया था, जिसके लिए ₹350 करोड़ का बजट जारी हुआ था। लेकिन अधिकारियों ने टेंडर की शर्तें ऐसी बनाईं कि मध्य प्रदेश के स्थानीय बुनकर, स्वयं सहायता समूह (SHG) और एमएसएमई (MSME) रेस से बाहर हो जाएं और टेंडर किसी एक खास बड़ी कंपनी को मिल सके। भंडार क्रय नियमों के खुले उल्लंघन के चलते यह मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट पहुंच गया, जहां कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने इस ₹350 करोड़ के टेंडर पर अंतरिम रोक लगा रखी है। जुलाई का अंतिम सप्ताह आ चुका है और मामला कोर्ट में लंबित है। सवाल यह है कि जब टेंडर ही फाइनल नहीं हुआ, तो कपड़े कब सिलेंगे और बच्चों को कब बंटेंगे?