भोपाल, सबकी खबर। 
भारत में महंगाई की एक ऐसी सुनामी दस्तक दे रही है जो आने वाले समय में आम आदमी, खासकर गरीब और मध्यम वर्ग की कमर तोड़ सकती है। पिछले 48 घंटों के घटनाक्रम इस बात के साफ संकेत दे रहे हैं कि आर्थिक मोर्चे पर स्थिति अब नियंत्रण से बाहर होने की कगार पर है। सोने और चांदी पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ने से उनकी कीमतों में जो आग लगी है, उसने मध्यम वर्ग के निवेश और भविष्य की सुरक्षा पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। वहीं, अमूल दूध और सीएनजी के दामों में हुई तत्काल बढ़ोतरी ने यह साफ कर दिया है कि सुबह के नाश्ते से लेकर दफ्तर जाने तक का सफर अब पहले जैसा सस्ता नहीं रहेगा।
 अर्थव्यवस्था के लिए काल साबित हो रहा हैं 'होर्मुज जलडमरूमध्य'
'सबकी खबर' के साथ हुए एक पॉडकास्ट में इस पूरे संकट का विश्लेषण किया गया। चर्चा में यह बात निकलकर आई कि इस संकट के पीछे का असली खेल अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर खेला जा रहा है। पश्चिम एशिया में गहराता युद्ध का साया और 'होर्मुज जलडमरूमध्य' जैसे रणनीतिक समुद्री मार्ग पर ईरान का दावा पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए काल साबित हो सकता है। इसी रास्ते से दुनिया का बड़ा तेल व्यापार होता है, और इसके बाधित होने की आशंका ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को 115 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचा दिया है।
यह संकट बहुआयामी है... 
पॉडकास्ट में अजय बोकिल ने आगाह किया कि यदि यह तनाव आने वाले कुछ हफ्तों में शांत नहीं हुआ, तो पेट्रोल और डीजल के दामों में होने वाली वृद्धि पूरे देश में माल ढुलाई को इतना महंगा कर देगी कि हर छोटी-बड़ी जरूरत की चीज आम आदमी की पहुंच से दूर हो जाएगी। यह संकट बहुआयामी है; एक तरफ खाड़ी देशों में काम ठप होने से लाखों भारतीय मजदूर अपनी रोजी-रोटी खोकर स्वदेश लौट रहे हैं, तो दूसरी तरफ देश के भीतर भी निजी क्षेत्र में न तो नौकरियां बढ़ रही हैं और न ही वेतन। शेयर बाजार की चमक भी अब फीकी पड़ने लगी है क्योंकि विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा निकालकर एआई (AI) और डेटा सेंटर जैसी भविष्य की तकनीकों में शिफ्ट कर रहे हैं। इस चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि भारत के पास अपने निजी डेटा सेंटर की कमी होना इस तकनीकी युग में एक बड़ी आर्थिक कमजोरी बनकर उभरा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि आने वाली लड़ाई 'आटा' के लिए नहीं बल्कि 'डेटा' के लिए होगी।
सतर्कता और आर्थिक अनुशासन ही एकमात्र बचाव
इस भयावह आर्थिक परिदृश्य के बीच अब नागरिकों को अपनी 'फिजूलखर्ची' पर पूरी तरह लगाम लगानी होगी। शादियों में होने वाला बेहिसाब खर्च और अनावश्यक निवेश अब जोखिम भरा हो सकता है। सरकार भले ही 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज दे रही हो, लेकिन मध्यम वर्ग के लिए अपनी गरिमा और जीवनशैली को बचाए रखना अब एक बड़ी चुनौती है। 'सबकी खबर' के इस पॉडकास्ट का सार यही है कि जब तक वैश्विक संकट टल नहीं जाता, तब तक देश के 140 करोड़ नागरिकों के लिए सादगी, सतर्कता और आर्थिक अनुशासन ही एकमात्र बचाव है। आने वाले समय में यदि यह संकट लंबा खिंचता है, तो भारी जन-असंतोष की स्थिति भी निर्मित हो सकती है।