भोपाल, सबकी खबर। 
मध्य प्रदेश की शराब नीति ने इस समय पूरे  प्रदेश के छोटे से बड़े शहरों की सड़कों  को मयखाने में बदल दिया है। जहां देखिए  वहां शराब की बोतलें मिलेगी। शराब पीते हुए लोग मिलेंगे। एक भगवाधारी साध्वी के पत्थर उठाने मध्य प्रदेश की शराब नीति बदल जाती है। वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में तो सीधे मुख्यमंत्री ही महंत भगवाधारी को ही मुख्यमंत्री बना रखा है। लेकिन  वहां किसी का पत्थर काम नहीं आता है। वहां  उन्होंने जो तय कर लिया वो होता है। अगर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की शराब नीति की तुलना  करे तो मध्य प्रदेश  में शराब नीति को नैतिकता में बदल दिया है और इस नैतिकता ने पूरी जनता को परेशान करके रख दिया है। हमने सुना है अनादि काल से यह जो मदिरा का सेवन होता आया  है और अनादि काल तक होता रहेगा। लेकिन  इसको लेकर सरकार की जो नीतियां हैं उस पर  पुनर्विचार की आवश्यकता है? आज लगभग 2012 या 13 मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री को एकदम सनक उठी थी। सनक इसलिए भी कहा जा सकता हैं कि शिवराज को लोक​प्रियता की एक अलग ही सनक थी अपनी लोकप्रियता के लिए मध्य  प्रदेश के खजाने को कोई चोट भी पहुंचती है तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी और उन्होंने एक फैसला किया कि मध्य प्रदेश में कोई भी नई शराब डिस्टलरी नहीं खुलेगी। नई ब्रीवरीज नहीं खुलेगी। प्रदेश में 2012-13 में अंतिम डिस्टलरी खुली। अब मध्य प्रदेश की आबादी उस समय थी 7 करोड़ आज 9 करोड़ से ज्यादा है। सोचने वाली बात यह है कि क्या शराब का उत्पादन नहीं बढ़ा है? क्या शराब की तस्करी नहीं बढ़ी है? तो जब शराब का उत्पादन बढ़ा है तो आपने नई फैक्ट्री को खुलने से क्यों रोका है? क्या डॉ. मोहन यादव इस पर विचार नहीं कर सकते हैं। जब मोहन यादव शिवराज के सीएम राइज का स्कूलों को नाम बदल सकते हैं तो क्या सरकार को आ​र्थिक आधार देने वाले शराब नीति को नहीं बदल सकते है। पूरे मध्य प्रदेश में आप विश्वास करेंगे केवल 10 डिस्टलरी है और तीन बियर बनाने की फैक्ट्री है। टोटल 13 फैक्ट्री हैं। उत्तर प्रदेश में देख लीजिए दोनों मिला लें तो 100 से ज्यादा हैं। तो मध्य प्रदेश में ऐसा क्या है कि शराब का उत्पादन तो बढ़ेगा लेकिन बनाएंगी वही फैक्ट्रियां जिनको लाइसेंस है और नए लाइसेंस हम देंगे नहीं। तो यह जो पॉलिसी है यह समझ से बाहर है। इससे आर्थिक नुकसान भी हो रहा है। आपको परिवहन की दिक्कतें भी हो रही  है। लेकिन क्या कारण है कि सरकार इस पॉलिसी को बदलना नहीं चाहती? इसके अलावा मप्र सरकार ने यह तो कसम खा रखी है कि शराब की दुकानें 3400 ही होंगी। 3400 दुकानें हैं। उत्तर प्रदेश चले जाइए। वहां 35,000 दुकानें हैं। उत्तर प्रदेश की एक पॉलिसी है। यदि किसी जिले में 50 लीटर से ज्यादा अवैध शराब जब्त हो जाए तो कलेक्टर को अधिकार है दो नई दुकान खोलने का। मतलब वहां दुकानें खुलने से परहेज नहीं है। हमारे यहां दुकानें खुलने से परहेज है। बेशक उन दुकानों के बाहर खुल के खुल के शराब सड़क पर पी रहे हैं लोग। आहाते बंद करा दिए गए हैं। क्योंकि दीदी ने पत्थर उठा लिया था। कम से कम अहाते में एक जगह बैठ के पी रहे थे। अब खुलेआम सड़क  पर पी रहे हैं। अब कौन देखेगा इस चीज को? कौन देखेगा? 
अब सवाल यह उठ रहा कि गत सप्ताह शनिवार को सीहोर में एक कार्यक्रम हुआ था। कुछ फैक्ट्रियों का भूमि पूजन और कुछ का शिलान्यास और कुछ का उद्घाटन भी वहां एक फैक्ट्री आई है माल्ट की फैक्ट्री। माल्ट बनाने की। यह अनाज से बनाया जाता है एक ऐसा पदार्थ जो शराब में उपयोग होता है। अब इसमें मजेदार बात यह है कि शराब में उपयोग होने वाला रॉ मटेरियल मो मप्र में बनेगा और उसकी सप्लाई अन्य राज्यों में होगी। वाह री मध्यप्रदेश सरकार।  मध्य प्रदेश में नई फैक्ट्री नहीं खुलेगी। यह मतलब थोड़ा सा समझ से बाहर है। आप 10 डिस्टलरी को लगातार उत्पादन बढ़वाते जा रहे हैं। उनका वो अपनी  उत्पादन क्षमता से ऊपर जा रहे हैं। लेकिन  आप नई डिस्टलरी की अनुमति नहीं दे रहे हैं। नई डिस्टलरी  की अनुमति देंगे तो नए रोजगार मिलेंगे। नए स्थान पे जाएंगे। लेकिन आप नहीं हीं दे रहे हैं। क्योंकि आपने कह दिया हमने तो नई डिस्टलरी खुलने नहीं दी। तो  क्या इससे शराब की तस्करी रुक गई? क्या इसकी शराब से  बिक्री रुक गई? क्या इससे वाकई शराब का जो व्यवसाय है वह हतोत्साहित हुआ है क्या? इसका आंकलन कैसे किया जा सकता हैं इसका जवाब किसी के पास नहीं है। शिवराज की उस एक नीति से आज पूरा प्रदेश मयखाना बना दिया गया हैं सडकों पर खुलेआम शराब पीते लोग खुले आम होता अवैध शराब का कारोबार। आप उत्पादन तो बढ़ाइए लेकिन ऐसा क्या है कि  आपने कसम खा ली है कि उत्पादन उन्हीं 10 फैक्ट्रियों में करेंगे। हम अन्य  फैक्ट्रियों में नहीं करेंगे। तो यह जो जिद है सरकार की सरकार को एक बार विचार  जरूर करना चाहिए। प्रदेश में लगभग लगभग 17 हजार करोड़ रेवेन्यू शराब और शराब से जुडे अन्य कारोबार से आता है। वहीं उत्तर प्रदेश यह राशि शायद 50 हजार करोड़ के आसपास होगी। लेकिन सवाल यहां यह है कि मध्य प्रदेश में तमाम सारी नीतियों को नैतिकता को ओढ़ के रखा है। यहां शराबबंदीवहां शराबबंदी वो बहुत अच्छी बात है। लेकिन मध्य प्रदेश में हमने नर्मदा नदी के 5 कि.मी. तक दुकानें खुलने से मना किया। तो क्या उत्तर प्रदेश में गंगा नहीं है? वहां यमुना नहीं है? क्या यह 5 किलोमीटर शराब बंदी से नर्मदा की सेहत पर क्या असर पड़ा है? क्या वहां सब कुछ शांत भो हो गया है? सात्विकता आ गई है? सब सात्विक हो गए हैं वहां पर। इसका रिव्यु तो करना चाहिए। यदि आपने यह निर्णय लिया है कि हम नर्मदा घाट से इतनी दूर तक शराब को प्रतिबंधित कर  रहे हैं तो साल 2 साल 3 साल बाद आपको रिव्यु करना चाहिए कि इसके क्या लाभहानि हुए हैं? यदि आपने 2012 में नई फैक्ट्रियां खोलने से मना कर दिया तो  रिव्यू करिए कि नई फैक्ट्री खोलने से क्या  मध्य प्रदेश में शराब की खपत कम हो गई?  क्या लोग शराब पीने वाले कम हो गए? यदि नहीं हुए तो फिर आप अपनी इस पॉलिसी को  बदलिए। तीसरा एक बहुत महत्वपूर्ण बात है।  आपने आहाते बंद कर दिए। स्वावग योग्य निर्णय था। जिससे लगा था कि अब शराब की खपत कम होगी माहौल सुधरेगा। लेकिन आज मध्य प्रदेश के  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निवास से आप  थोड़ा सा पैदल चल के पॉलिटेक्निक चौराहे आ  जाइए। सुबह 8:00 बजे से रात को 11 बजे तक  ढेर सारे शराबी सड़क पर बैठ
के शराब पीते हैं। मुख्यमंत्री निवास से  चंद कदमों की दूरी पर तो फिर ऐसी पॉलिसी का  क्या फायदा? इससे तो आते ठीक थे कि आहाते  में बैठ के पी लेते थे, घर जाते थे, नहीं  जाते थे। यहां तो खुलेआम आप देखिए किसी भी शहर में, किसी भी गांव में, किसी भी कस्बे  में चले जाइए। आज सड़कें मयखाना बन चुकी  है। इसको कौन देखेगा? ऐसी क्या जिद्द है कि मध्य प्रदेश में 3400 से ज्यादा एक दुकान नहीं होगी। शराब की दुकानें बढ़ाने में दिक्कत क्या है? कि यह जवाब किसी के पास नहीं है। बात यह है कि मध्यप्रदेश ने नैतिकता की खोखली चादर ओढ़ ली है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। नैतिकता की सरकार है और यहां भगवाधारी साध्वी ने विरोध किया  लेकिन उत्तर प्रदेश में तो आपके महंत जी हैं। उनकी पॉलिसी का अध्ययन कर लेते । आम आदमी कैसे इन शराबियों से बच सकता है। उसका कोई तरीका निकालिए। शराब का अवैध परिवहन हो रहा है। उसका कोई तरीका निकालिए। यदि इसको निकालने के लिए यदि अहाते खोलने पड़े तो आते खोलिए। अहाते के विरोध में हम भी है लेकिन अहाते बंद हो जाने के बाद  सड़कें अहाते बन गई हैं। इसका तो दुख है ना। नई नई फैक्ट्रियों को क्यों बैन लगाया है? क्या 2012 से ले 2025 तक क्या ऐसी कोई कमेटी बनाई गई जो अधिकारियों की हो जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता हो जिसमें आम लोग हो कुछ महिला प्रतिनिधि भी हो और उनकी कमेटी यह रिव्यू कर ले कि नई फैक्ट्रियां ना खुलने से क्या मध्य प्रदेश में शराब की खपत कम हुई है क्या मध्य प्रदेश में लोगों को शराब पीने की आदत कम कर ली हो यदि नहीं कर पाए हैं तो क्या इस पॉलिसी को बदला जाएगा यह भी तय करना चाहिए कि क्या  आहतें बंद हो जाने के बाद आम आदमी को परेशानी खत्म हो गई है आते बंद होने से या और परेशानी बढ़ी है। यह रिव्यु कौन करेगा? इन तमाम सारे मुद्दों को एक ऐसी कमेटी बनाए जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता हो, आम लोग हो, हमारी माता बहनों का प्रतिनिधित्व उसमें हो और  रिव्यू करना चाहिए शराब के मामले को लेकर। सरकार में बैठे हुए कुछ लोग सनक के आधार पर जो फैसले लेते हैं, इससे मध्य प्रदेश का हित नहीं होगा। एक साध्वी दीदी एक दुकान पर पत्थर  फेंकती है और सरकार की पॉलिसी बदल जाती है। इससे भी मध्य प्रदेश का हित नहीं होगा। समग्र विचार  करना होगा समग्र पूरी शराब नीति पर। कुछ लोग कहते हैं कि शराब बंद करा दिया जाना चाहिए। यदि उस पे भी  निर्णय लेना है तो आप ले लीजिए कि मध्य  प्रदेश में पूरी तरह शराबबंदी हो। लेकिन   फिर ऐसा नहीं होना चाहिए कि जिन राज्यों   में शराबबंदी है वहां शराब महंगी हो गई।  शराब सब जगह मिल रही है क्या अहमदाबाद में  शराब नहीं मिल रही या पटना में नहीं मिल रही शराब सब जगह मिलती है वहां महंगी हो  गई है वहां तस्करी होके जाती है वहां कहीं ना कहीं इस तरह का तो ये ये सारी चीजों पर  इस बार मोहन यादव की सरकार को एक बार मध्य प्रदेश की शराब नीति को लेकर कोई अच्छी कमेटी बनाना चाहिए संघ के लोगों को भी शामिल करना चाहिए। आप अपने राजनीतिक पार्टी के लोगों को भी शामिल करिए सभी राजनीतिक दलों को। आप समाज के विभिन्न वर्गों को शामिल करिए और उसके बाद तय करिए कि हमें क्या मध्य प्रदेश में पूरा शराबबंदी करनी है? क्या मध्य प्रदेश में अहाते खोलना चाहिए? क्या मध्य प्रदेश में नई शराब फैक्ट्रियों के बारे में हमने जो सनकी भरा निर्णय ले लिया है। सनकी भरा इसलिए कि उसके बाद शराब बंद हो जाना चाहिए थी। खपत कम होना चाहिए थी। डिस्टलरी ना खुलने से क्या शराब कम  हुई है क्या? बल्कि तस्करी बढ़ी है। दो  नंबर का काम बढ़ा है। इसमें लोगों नेताओं की जेबें भर रही हैं। तो ये सब चीजों पर  एक बार रिव्यू होना चाहिए।