शहडोल, सबकी खबर। 
मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के व्यवहारी से भ्रष्टाचार, प्रशासनिक सांठगांठ और बेशर्मी की एक ऐसी खौफनाक दास्तान सामने आई है, जिसने पूरे सूबे के सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है। ब्योहारी के के खड़हूली गांव में मध्य प्रदेश शासन की 'गैर हकदार' और 'चरनोई' (मवेशियों के चरने की सरकारी जमीन) की करीब 8 से 10 एकड़ बेशकीमती जमीन को वहां के पटवारियों, नायब तहसीलदारों और एसडीएम ने आपस में मिलकर कौड़ियों के दाम बंदरबांट कर लिया और अपने ही सगे-संबंधियों के नाम चढ़ा दिया। इस महाघोटाले की गूंज भोपाल के मंत्रालय (वल्लभ भवन) से लेकर शहडोल कलेक्ट्रेट तक थी, लेकिन मजाल है कि सरकार की नींद टूटी हो। खुद सूबे के राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने लिखित में स्वीकार किया कि जमीन ₹200 करोड़ की है और उन्होंने प्रमुख सचिव को जांच के आदेश दिए, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी फाइलें धूल खाती रहीं। वहीं, शिकायतकर्ता मुकेश मिश्रा का साफ कहना है कि वर्तमान बाजार भाव (₹890 प्रति स्क्वायर फीट या ₹3 लाख प्रति डिसमिल) के हिसाब से यह घोटाला ₹400 करोड़ से कम का नहीं है।
इस पूरे मामले में सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जिस सरकारी जमीन की रक्षा करना सरकार, मंत्रियों और बड़े-बड़े आईएएस अफसरों की जिम्मेदारी थी, उसे बचाने के लिए प्रशासन ने एक ढेला तक नहीं हिलाया। अंततः क्षेत्र के सजग नागरिक मुकेश मिश्रा ने तमाम जान-माल का जोखिम उठाकर माननीय न्यायालय में एक निजी इस्तगासा (परिवाद) दायर किया। कोर्ट के कड़े रुख के बाद, ब्योहारी थाना प्रभारी (टीआई) जो महीनों तक 'तारीख पर तारीख' का खेल खेलते रहे, उन्होंने आखिरकार 12 मई 2026 को अदालत में अपनी बेहद चौंकाने वाली जांच रिपोर्ट सौंप दी है। इस रिपोर्ट ने सारे रसूखदारों के चेहरों को बेनकाब कर दिया है। थाना प्रभारी ने स्पष्ट लिखा है कि शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप 'शब्दशः सिद्ध' हैं। पुलिस ने कोर्ट से सिफारिश की है कि तत्कालीन पटवारी राजेंद्र कुमार द्विवेदी और उनके पूरे कुनबे (पत्नी छाया शुक्ला, मांडवी द्विवेदी), पटवारी लक्ष्मी रेशमा तिवारी, संदीप तिवारी, पूर्णिमा तिवारी, राज ललित तिवारी के साथ-साथ तत्कालीन नायब तहसीलदार अमित मिश्रा, भुवनेश्वर सिंह, अभ्यानंद शर्मा और तत्कालीन एसडीएम नारायण सिंह धुरबे के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 317, 318, 335, 338, 340 और 344 के तहत संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज कर सख्त वैधानिक कार्रवाई की जाए। इस महाघोटाले का जो 'मोडस ऑपरेंडी' (काम करने का तरीका) सामने आया है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। इन भ्रष्ट पटवारियों और राजस्व अधिकारियों ने शासकीय रिकॉर्ड में हेराफेरी करके चुपके से 'मध्य प्रदेश शासन' और 'गैर हकदार चरनोई' शब्द को ही विलोपित (हटा) कर दिया। जमीन साफ होते ही पटवारी राजेंद्र द्विवेदी और अन्य राजस्व अधिकारियों ने यह जमीन फर्जी तरीके से पहले कुछ निजी लोगों के नाम चढ़ाई और फिर रजिस्ट्री (विक्रय पत्र) के माध्यम से उसे अपने माता-पिता, भाई-बहन और पत्नियों के नाम पर क्रय कर लिया। अब वही पटवारी और उनका परिवार उसी सरकारी जमीन के टुकड़े कर-करके धड़ल्ले से बाजार में बेच रहे हैं और करोड़ों रुपए अपनी जेबों में भर रहे हैं।
कलेक्टर साहब के हाथ आखिर किसने बांध रखे हैं?
हैरानी की बात यह है कि शहडोल के कलेक्टर डॉ. केदार सिंह खुद कैमरे पर यह कबूल कर रहे हैं कि हां, जमीन के रिकॉर्ड में खेल हुआ है, तहसीलदार और पटवारी को ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं था, यह पूरी तरह से प्रशासन का अधिकार क्षेत्र था और हम इस पर कार्रवाई कर रहे हैं। लेकिन फरवरी 2026 में दिए गए इस बयान के बाद मार्च, अप्रैल और अब मई का आधा महीना बीत चुका है, कलेक्टर साहब के हाथ आखिर किसने बांध रखे हैं? क्या इस ₹400 करोड़ की मलाई का हिस्सा भोपाल से लेकर शहडोल तक के बड़े साहबों और दलालों के खातों में पहुंच चुका है, जो इस खुले डाके पर सब 'धृतराष्ट्र' बने बैठे हैं? एक आम और सीधा-साधा नागरिक अकेले इस भू-माफिया तंत्र से कोर्ट-कचहरी और थानों के चक्कर काटकर लड़ रहा है और पूरी सरकार तमाशबीन बनी हुई है। कोर्ट की इस ताजा रिपोर्ट के बाद अब गेंद जज साहब के पाले में है, जहां से आदेश होते ही इन भ्रष्ट अफसरों की गिरफ्तारी तय है। लेकिन 'सबकी खबर' शहडोल कलेक्टर और मध्य प्रदेश सरकार से सीधे सवाल पूछती है कि भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देना बंद कीजिए और जनता की इस ₹400 करोड़ की सरकारी जमीन को तत्काल मुक्त कराकर वापस सरकारी खाते में दर्ज कीजिए, वरना जनता इस लूट को कभी माफ नहीं करेगी।