सीहोर/भोपाल, सबकी खबर। 
मध्य प्रदेश में उच्च शिक्षा व्यवस्था किस कदर भ्रष्टाचार और रसूखदारों की गिरफ्त में है, इसका एक चौंकाने वाला नमूना सीहोर जिले के श्यामपुर से सामने आया है। यहाँ एक स्कूल की बिल्डिंग में रातों-रात 'आर्यावर्त विश्वविद्यालय' खड़ा हो गया, लेकिन जब इसकी जांच के आदेश हुए, तो उच्च शिक्षा विभाग के बड़े अफसरों ने ही जांच रोकने के लिए मोर्चा खोल दिया।
स्कूल के कैंपस में कैसे उग आया विश्वविद्यालय?
सामाजिक कार्यकर्ता भगवान सिंह राजपूत ने 9 जनवरी 2026 को कलेक्टर से शिकायत की थी कि आर्यावर्त विश्वविद्यालय पूरी तरह कागजी जालसाजी पर आधारित है। आरोप है कि जिस बिल्डिंग में 'रुक्मणी देवी पब्लिक स्कूल' (CBSE) चल रहा है, उसी कैंपस में बिना जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर, लैब, लाइब्रेरी और फैकल्टी के यह यूनिवर्सिटी संचालित की जा रही है।
जांच शुरू होते ही 'बड़े साहबों' के पेट में दर्द
कलेक्टर के निर्देश पर सीहोर के 'प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस' के प्राचार्य डॉ. रोहिताश कुमार शर्मा ने 21 फरवरी को एक जांच टीम गठित की। लेकिन जैसे ही टीम जांच के लिए तैयार हुई, उच्च शिक्षा विभाग के दो कद्दावर अधिकारियों के फोन घनघनाने लगे डॉ. अनिल पाठक (OSD, उच्च शिक्षा विभाग): इन्होंने फोन कर प्राचार्य को जांच रोकने का मौखिक आदेश दिया। वहीं एडिशनल डायरेक्टर डॉ. मथुरा प्रसाद फोन कर दबाव बनाया कि आर्यावर्त की जांच नहीं होगी।
प्राचार्य का कड़ा रुख
दबाव में झुकने के बजाय प्राचार्य डॉ. रोहिताश शर्मा ने 28 फरवरी को सीधे प्रमुख सचिव (PS) को पत्र लिखकर पूरे मामले की जानकारी दे दी है। उन्होंने साफ लिखा है कि इन अधिकारियों के फोन के कारण जांच प्रक्रिया बाधित हो रही है।
कौन हैं इसके पीछे? छतरपुर से भी जुड़े हैं तार
खबर के मुताबिक, इस यूनिवर्सिटी के संचालक बृजेंद्र सिंह गौतम और पुष्पेंद्र गौतम हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इनका एक और संस्थान 'श्री कृष्णा विश्वविद्यालय' (छतरपुर) पहले से ही विवादों में है। हाल ही में कानपुर में पकड़े गए एक शिक्षा माफिया के पास से इस यूनिवर्सिटी की 103 फर्जी मार्कशीट बरामद हुई थीं।
बड़ा सवाल: आखिर डर किसका है?
जब जांच के आदेश कलेक्टर ने दिए, तो विभाग के ओएसडी और एडिशनल डायरेक्टर सीधे कलेक्टर से बात करने के बजाय एक प्राचार्य पर दबाव क्यों बना रहे हैं? क्या इन अधिकारियों को डर है कि जांच हुई तो कई बड़े चेहरे बेनकाब हो जाएंगे? यह मामला केवल एक यूनिवर्सिटी का नहीं, बल्कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था के साथ हो रहे खिलवाड़ का है। 'सबकी खबर' की इस रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि यदि इस मामले की जांच EOW (आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ) या लोकायुक्त से नहीं कराई गई, तो फर्जी मार्कशीटों और बिना इंफ्रास्ट्रक्चर वाली इन 'डिग्री फैक्ट्रियों' पर लगाम लगाना नामुमकिन होगा।