देश की राजनीति में क्रूर और संवेदनहीन परंपरा की सियासत का उदय हो चुका है: राजेश बादल
भोपाल, सबकी खबर।
पांच राज्यों के राज्यपाल रहे। कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे। सत्यपाल मलिक जी उनका निधन हुआ और उनके निधन के बाद में एक पत्र बहुत तेजी से वायरल हुआ। यह पत्र उन्होंने 7 जून को लिख के ही सोशल मीडिया पर डाल दिया था और यह कहा था कि मेरी मृत्यु के बाद इस पत्र को हर व्यक्ति तक पहुंचा देना और वो पत्र था केंद्र सरकार की की मतलब विफलताओं पर और उन्हें जो रिश्वत की पेशकश की गई थी उन तमाम सारी चीजों का उन्होंने उल्लेख किया था लेकिन इसके बाद में भारत सरकार किस कदर नाराज हुई देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केवल डेढ़ लाइन का एक ट्वीट किया संवेदना का इसके अलावा पूरी भारतीय जनता पार्टी और केंद्र केंद्र सरकार को जैसे सांप सूंघ गया। एक भी नेता ने संवेदनाएं व्यक्त नहीं की और यदि संवेदनाएं व्यक्त नहीं की तो कोई बात नहीं। लेकिन इसके बाद में जो हुआ वो और ज्यादा दुखद है। हुआ यह कि एक भी केंद्रीय मंत्री उनके अंतिम संस्कार में नहीं गया। एक भी केंद्रीय मंत्री या भारतीय जनता पार्टी के किसी बड़े नेता ने उनके प्रति एक भी ट्वीट नहीं किया उनके मृत्यु पर। आप सोचिए क्या वाकई राजनीति संवेदन शून्य होती जा रही है? क्या हम राजनीति में इस कदर नीचे उतर चुके हैं कि अब मौत के बाद भी हम राजनीति करेंगे? इन तमाम सारे मुद्दों पर सबकी खबर ने प्रदेश के बड़े पत्रकार राजेश बादल से समझा आखिर किस तरह की राजनीति अब देश में हो रही हैं इंतनी संवेदनहीनता शायह ही पहले कभी देखी गई हो। इस संबंध में श्री बादल ने कहा कि पाकिस्तान के एक शायर हैं। नाम मैं भूल रहा हूं। उन्होंने लिखा था कि जाती हुई मैयत देख के तुम अल्लाह उठकर आ ना सके। अरे दो चार कदम तो दुश्मन भी तकलीफ गंवारा करते हैं। यह यह ठीक है कि सत्यपाल मलिक का जो कद है उनके अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान से हो या ना हो इससे उनका कद छोटा नहीं होता। मलिक को मैं एक ऐसे वरिष्ठ मित्र की हैसियत से याद करूंगा। मेरा उनसे संपर्क था। कई बार बातचीत हुई कि जो राज्यपाल जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद पर रहते हुए किसानों को लेकर अपने सरोकारों को नहीं भूला और जब मुझे याद है कि वह किसानों की पंचायत में आए थे तब राज्यपाल थे। तो ऐसी सूरत में एक राज्यपाल जो कि राष्ट्रपति का प्रतिनिधि होता है अह उन्होंने अपने सरोकारों को प्राथमिकता दी। तो उनके जो अंतिम संस्कार में वह प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया। इससे मलिक जी का कुछ नहीं बिगड़ा। बिगड़ा है उस व्यवस्था का जो निर्वाचन के जरिए लोकतांत्रिक पद्धति से काम करने का दावा करती है। मेरे कहने का मतलब यह है अगर सरकार जाती तो शायद उसका कुछ मान बढ़ जाता। सरकार के प्रतिनिधि शामिल होते तो शायद मान बढ़ जाता। लेकिन ना जाके उसने एक ऐसी क्रूर और संवेदनहीन परंपरा सियासत में विकसित की है जो मुझे लगता है कि इसको इतिहास कभी माफ नहीं करेगा। प्रोटोकॉल का एक अपना जो प्रोटोकॉल होता है उसका एक ऐसा नहीं है कि एक कॉन्स्टिट्यूशनल व्यवस्था है और राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति प्रधानमंत्री राज्यपाल मुख्यमंत्री सेना के कुछ आला अधिकारी शहीद इस देश के जब हम ऐसे व्यक्ति तक को राजकीय सम्मान के साथ विदाई देते हैं जो इस देश को कुछ देके गया है तो सतपाल मलिक जी को हम भुला नहीं सकते। आपने जैसे अभी अपने शुरुआती उद्बोधन में कहा कि कुछ दिन पहले शायद उनको आभास हो गया था अपनी अपने अपने जाने का और एक जब व्यक्ति जाने लगता है तो जाते हुए फिर वो हमें मानना चाहिए कि वह झूठ नहीं बोलता। जैसे कि एक कानूनी भाषा में डाइंग डिक्लेरेशन होता है। तो उन्होंने 300 करोड़ की रिश्वत की पेशकश की जो बात कही थी वह हमारी इस व्यवस्था पर एक शर्मनाक तमाचा है। यह राज्यपाल जैसे शिखर पद पर पेशकश की गई तो आप यह अंदाजा लगा सकते हैं कि कॉमन मैन क्या इस किन स्थितियों का सामना कर रहा होगा। मैं आपको कह सकता हूं कि संसार में मैंने तो जितना मुझे याद आता है और जितना पढ़ा है हर देश में निधन के बाद राजकीय सम्मान का एक प्रोटोकॉल की परंपरा है और आज तक संसार के किसी भी देश में मुझे एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिला जब कि प्रोटोकॉल की परंपरा का उल्लंघन हुआ हो। यहां हुआ है। एक एक आध चीजें जगह छोड़ के लेकिन वहां का तो लोकतंत्र है ही नहीं। पाकिस्तान में जिस तरह से भुट्टो को फांसी दी गई थी तो वो प्रधानमंत्री रह चुके थे तो वो नहीं होना चाहिए था लेकिन वहां तो संविधान ही नहीं चलता ना वहां का तो हर संविधान हर 8 10 साल में नया बदल जाता है फौज आ जाती है तो उसको तो हम गिने नहीं लेकिन जी बादल जी मैं यहां केवल राजकीय सम्मान की बात नहीं कर रहा हूं मैं बात कर रहा हूं सत्तारूढ़ पार्टी जो नैतिकता और सिद्धांत की बात हम सब करते हैं संघ भी करता है बीजेपी भी करती है वहां के नेताओं को जैसे सांप सूंघ गया हो। एक भी नेता के Twitter हैंडल पर संवेदना के दो शब्द नहीं थे। भारतीय संस्कृति में सनातन धर्म में यह परंपरा है कि उसको हम आलोचना नहीं करते। आप यह बताइए कि एक समाज में हम लोगों के दादा या परदादा या नाना या परनाना हो सकता है आपसे नाराजगी रही हो। लेकिन जब वो चले जाते हैं तो क्या हम रोज उनको आए दिन घर पर गालियां देते हैं? नहीं देते। तो पूर्वज हमारे ऐसे होते हैं कि हम उन पूर्वजों का सम्मान करना बचपन से सीखते हैं। जाने के बाद हमारे यहां भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि वो फिर आत्मा एक देवता हो जाती है और उस आत्मा उस देह रह जाती है लेकिन देह प्रतीक होती है उस आत्मा का। तो अगर उस आत्मा के प्रति हम सम्मान नहीं दिखा सकते तो आप समझिए कि कितना बड़ा मतलब हम मतलब असभ्य व्यवहार कर रहे हैं। और दूसरी तरफ आपने कहा जरूर जो हम बात कर रहे थे कि मैं मध्य प्रदेश विधानसभा की तारीफ करूंगा और सलाम करूंगा मध्य प्रदेश सरकार को कि उन्होंने सतपाल मलिक जी को विधानसभा में उनके कद के अनुरूप याद किया। श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके जो जो उनकी योग्यताएं हैं उनको याद किया। तो मुझे नहीं लगता कि किसी और विधानसभा में ऐसा कुछ किया गया हो जबकि करना चाहिए था क्योंकि राज्यपाल जो होता है वो अपने प्रदेश के संचालन का मुखिया होता है। कई राज्यों में वो राज्यपाल तो यहां राज्यपाल भी नहीं थे तब भी मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें पूरा सम्मान दिया। इसलिए तो सलाम करना चाहता हूं मध्य प्रदेश की सरकार को इस हुकूमत को कि कम से कम उन्होंने सतपाल मलिक को याद करा। उन्होंने याद किया लेकिन जिन्होंने नहीं किया उनके प्रति मैं जो है मतलब सिवाय इसके कि हे ईश्वर वो नहीं जानते कि वह क्या कर रहे हैं।

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