रतलाम की नसों में घुलता 'कैंसर': डग-डग रोटी और पग-पग नीर वाले मालवा में अब नल से टपक रही है मौत!
रतलाम, सबकी खबर।
डग-डग रोटी और पग-पग नीर की मिसाल देने वाले मालवा की आबोहवा में अब 'कैंसर' घुल चुका है। जिस पानी को पीकर कभी जिंदगी मुस्कुराती थी, आज वही पानी साइलेंट किलर बनकर रतलाम के साढ़े तीन लाख लोगों की नसों में जहर उतार रहा है। यह महज आरोप नहीं, बल्कि सरकारी लैब की वो डरावनी रिपोर्ट है जो चीख-चीख कर कह रही है कि रतलाम नगर निगम जनता को पानी नहीं, बल्कि मौत की खुराक पिला रहा है। धिक्कार है उन सफेदपोश हुक्मरानों और मोटी तनख्वाह डकारने वाले उन अंधे-बहरे अफसरों पर, जिनकी नाक के नीचे जनता मल युक्त पानी (सीवरेज) पीने को मजबूर है। मध्य प्रदेश का सबसे 'स्मार्ट' शहर इंदौर जब दूषित पानी से हुई 38 मौतों का मातम मना रहा था, तब रतलाम प्रशासन अपनी कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ था। आज रतलाम की स्थिति यह है कि यहाँ के पेयजल में 'टोटल कोलीफॉर्म' और 'फिकल कोलीफॉर्म' की मात्रा शून्य होनी चाहिए थी, लेकिन वह 760 के पार जा चुकी है। इसका सीधा मतलब यह है कि आपके घरों के नलों में सीधे तौर पर गटर की गंदगी और मल सप्लाई हो रहा है। पीएचई की रिपोर्ट बताती है कि इस पानी में नाइट्रेट की मात्रा तय सीमा से कहीं ज्यादा है, जो लीवर, किडनी फेलियर और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों को सीधा निमंत्रण दे रही है। हैरानी की बात यह है कि रतलाम में ऊपर से नीचे तक 'पांच इंजन' की सरकार है—सांसद, विधायक, महापौर और पार्षद सब एक ही पार्टी के हैं, लेकिन जनता की प्यास बुझाने के नाम पर उन्हें जहर परोसा जा रहा है। इस सिस्टम की बेशर्मी का आलम देखिए कि जब एक अकेला पार्षद सलीम मोहम्मद बागवान अपनी जेब से पैसे खर्च कर पानी की जांच कराता है और एनजीटी (NGT) तक लड़ाई लड़ता है, तो उसे 'पागल' करार दिया जाता है। सत्ता के मद में चूर लोग सुधार करने के बजाय उस व्यक्ति के वार्ड का बजट रोककर उससे बदला लेने में जुटे हैं।
साढ़े तीन लाख लोगों की जिंदगी से खिलवाड़
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के भ्रष्ट अधिकारी भी इस पाप में बराबर के भागीदार हैं। एनजीटी को गुमराह करने के लिए दोपहर में उस समय सैंपल लिए जाते हैं जब गंदा पानी निकल चुका होता है। यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि साढ़े तीन लाख लोगों की जिंदगी के साथ किया जा रहा संगठित अपराध है। अधिकारी एयर कंडीशन कमरों में बैठकर फाइलों पर 'ऑल इज वेल' लिख रहे हैं, जबकि हकीकत में रतलाम के हर घर में मौत का प्याला पहुँच रहा है। अगर अब भी इन जिम्मेदारों की गैरत नहीं जागी, तो आने वाली पीढ़ियां इन्हें कभी माफ नहीं करेंगी। 20 मई को एनजीटी की आखिरी सुनवाई है, और उम्मीद है कि वहां से आने वाला हंटर इन बहरे कानों और सोए हुए जमीर को झकझोरने का काम करेगा।

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