अब अभय चौटाला के फॉर्महाउस में रहेंगे धनखड़, इस्तीफे के 42 दिन बाद उपराष्ट्रपति आवास छोड़ा: 21 जुलाई को पद से इस्तीफा दिया था
नई दिल्ली।
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ अब दक्षिणी दिल्ली के छतरपुर इलाके में स्थित अभय चौटाला के फॉर्महाउस में रहेंगे। सोमवार शाम 6 बजे उन्होंने इस्तीफे के 42 दिन बाद उपराष्ट्रपति आवास छोड़ा। इंडियन नेशनल लोकदल के प्रमुख अभय चौटाला ने बताया कि हमारे परिवार के घनखड़जी से पुराने रिश्ते रहे हैं। हमने उनसे हमारे घर में रहने की अपील की, जो उन्होंने मान ली। धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए मानसून सत्र के पहले दिन 21 जुलाई को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। तब वे सार्वजनिक कहीं नजर नहीं आए। इस दौरान विपक्ष ने हाउस अरेस्ट जैसे कई आरोप लगाए। हालांकि सरकार ने इनसे इनकार किया। धनखड़ वे अब तक संसद भवन के पास उपराष्ट्रपति एन्क्लेव में रह रहे थे। उनका कार्यकाल 10 अगस्त 2027 तक था।
टाइप-8 बंगला मिलने तक फॉर्महाउस में रहेंगे
धनखड़ अभय चौटाला के फार्महाउस में तब तक रहेंगे जब तक उन्हें टाइप-8 सरकारी बंगला आवंटित नहीं कर दिया जाता, जिसके वे पूर्व उपराष्ट्रपति होने के नाते हकदार हैं। धनखड़ के करीबी सूत्रों ने बताया कि वे अपने परिवार के साथ समय बिता रहे हैं, टेबल टेनिस खेल रहे हैं और योग का अभ्यास कर रहे हैं।
धनखड़ और चौटाला परिवार के बीच करीब 40 साल पुराना रिश्ता
धनखड़ और चौटाला परिवार के बीच करीब 40 साल पुराना रिश्ता रहा है। 1989 में हरियाणा के बड़े जाट नेता और तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल ने राजस्थान के युवा वकील धनखड़ को फ्यूचर का लीडर कहा था। धनखड़ देवीलाल को अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं।उसी दौर में दिल्ली के बोट क्लब पर देवीलाल के जन्मदिन पर विपक्षी रैली में धनखड़ ने 500 गाड़ियां राजस्थान से जुटाई थीं। इसके बाद 1989 लोकसभा चुनाव में देवीलाल ने धनखड़ को झुंझुनूं सीट से टिकट दिया। खुद प्रचार भी किया। चुनाव जीतने पर जब देवीलाल उपप्रधानमंत्री बने तो धनखड़ को भी सरकार में मंत्री पद मिला। हालांकि, जब वीपी सिंह ने देवीलाल को मंत्रिमंडल से बाहर किया तो धनखड़ अकेले मंत्री थे जिन्होंने विरोध में इस्तीफा दिया।
2 दिन पहले पेंशन के लिए आवेदन किया था
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 30 अगस्त को पूर्व विधायक के नाते मिलने वाली पेंशन के लिए राजस्थान विधानसभा सचिवालय में फिर से आवेदन किया है। धनखड़ 1993 से 1998 तक किशनगढ़ सीट से कांग्रेस के विधायक रहे थे। पूर्व विधायक के तौर पर उन्हें जुलाई 2019 तक पेंशन मिल रही थी। जुलाई 2019 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बनने के बाद पेंशन बंद हो गई थी।

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