फर्जी जाति प्रमाणपत्र लगाने वाले गुना के पूर्व विधायक सलूजा को नहीं मिलेगी पेंशन: सुको
- हाईकोर्ट द्वारा पिटीशनर पर लगाई कास्ट भी खत्म
ग्वालियर, सबकी खबर।
गुना आरक्षित विधानसभा सीट से फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर 2008 में विधायक चुने गए राजेंद्र सिंह सलूजा को अब पूर्व विधायक की हैसियत से पेंशन नहीं मिलेगी। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने वंदना मांडरे द्वारा मप्र हाईकोर्ट के उस निर्णय के खिलाफ दायर याचिका पर दिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनका पक्ष सुने बिना हाईकोर्ट ने उनकी याचिका पर एकतरफा निर्णय दिया है। इतना ही नहीं हाईकोर्ट ने वंदना मांडरे पर 50 हजार रुपए की कास्ट भी लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व विधायक राजेंद्र सलूजा की पेंशन रोकने के साथ हाईकोर्ट द्वारा वंदना मांडरे पर लगाई गई कास्ट भी खत्म कर दी है। गौरतलब है कि राजेंद्र सलूजा पर आरोप लगे थे कि उन्होंने गलत जानकारी देकर गुना के एसडीएम से अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र प्राप्त किया था। विधायक बनने के बाद वे शासन से मिलने वाली सभी सुविधाओं का लाभ देते रहे तथा बाद में पूर्व विधायक की सभी सुविधाओं का लाभ भी लिया, जबकि राजेंद्र सिंह सलूजा द्वारा असत्य आधारों पर प्राप्त जाति प्रमाणपत्र को राज्य छानबीन समिति मप्र ने अपने आदेश दिनांक 10 अगस्त 2011 द्वारा निरस्त कर राजसात करने एवं वैधानिक कार्रवाई करने के आदेश दिए थे। इसके बाद राजेंद्र सिंह सलूजा ने 26 मई 2012 को अपना असत्य आधारों पर प्राप्त अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र एसडीएम गुना के यहां जमा करा दिया था। गया। इसके बाद उनका चुनाव अवैध होकर शून्य घोषित होने की स्थिति बन गई थी। फिर भी सलूजा विधिवत विधानसभा की कार्रवाइयों में हिस्सा लेकर विधायक को मिलने वाली सभी सुविधाओं का लाभ उठाते रहे। दिसंबर 2013 में अगली विधानसभा का गठन हुआ। इसके बाद वे पूर्व विधायक की पेंशन व अन्य सुविधाओं का लाभ उठाते रहे।
इसको लेकर वंदना मांडरे ने विधानसभा अध्यक्ष एवं राज्य निर्वाचन आयोग को कार्रवाई हेतु पत्र भी लिखे, किन्तु न तो विधायक, न ही पूर्व विधायक की हैसियत से मिलने वाली सुविधाएं बंद हुई, न चुनाव शून्य घोषित हुआ। राज्य शासन के इस तरह के विधि विरुद्ध संरक्षण से निराश होकर वंदना मांडरे ने उच्च न्यायालय, खंडपीठ ग्वालियर में पीआईएल दायर की, जिसका क्र. 5512/16 था। हाईकोर्ट ने पक्षकार के जवाब आए बिना पिटीशन को एकतरफा खारिज कर वंदना मांडरे पर 50 हजार रुपए की कास्ट लगा दी थी। उच्च न्यायालय खंडपीठ ग्वालियर के निर्णय से असंतुष्ट होकर उन्होंने सर्वोच्च्य न्यायालय नई दिल्ली में अपील दायर की, जिसका क्र. 17705/17 था। इस अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम निर्णय पारित किया, जिसमें स्वीकार किया गया कि वर्ष 2008 में राजेंद्र सिंह सलूजा ने अनुसूचित जाति का न होने के बावजूद कपटपूर्ण ढंग से बनाए जाति प्रमाण पत्र के आधार पर चुनाव लड़कर आरक्षित सीट से विजय प्राप्त की है। इसलिए क्यों न पेंशन रोकते हुए वसूली की कार्रवाई की जाए और आपराधिक प्रकरण भी चलाया जाए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने शपथ पत्र मांगा तो राजेंद्र सिंह सलूजा के वकील ने शपथ पत्र पेश करने के लिए 4 हफ्ते का समय मांगा था।
सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय से पूर्व राजेंद्र सिंह सलूजा ने 27 मार्च 2025 को अपना शपथ पत्र पेश किया। उसमें लिखा कि मैं पूर्व विधायक की पेंशन व अन्य सुविधाएं नहीं लूंगा। सुप्रीम कोर्ट ने राजेंद्र सलूजा के शपथ पत्र के आधार पर 14 जुलाई 2025 को दिए आदेश क्र. 17705/17 द्वारा पूर्व विधायक की पेंशन समाप्त करते हुए हाईकोर्ट द्वारा वंदना मांडरे पर लगाई गई 50 हजार रुपए की कास्ट भी खत्म कर दी।
ये उठ रहे सवाल----
- 1. जाति प्रमाणपत्र समर्पित करने के बाद भी विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें कार्रवाई में भाग कैसे लेने दिया।
- 2. राजेंद्र सलूजा को लगभग डेढ़ वर्ष तक वेतन भत्ते तथा लगभग 12 वर्ष टैक्स पेयर के पैसों से पेंशन व अन्य सुविधाएं क्यों प्रदान की जाती रहीं।
- 3. कपटपूर्ण जाति प्रमाण पत्र से चुनाव लड़ने तथा अनुसूचित वर्ग की आरक्षित सीट से उनके स्वत्व को हड़पने वाले आपराधिक व्यक्ति को 6 वर्ष के लिए निर्वाचन आयोग ने अयोग्य घोषित क्यों नहीं किया।

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