ज्योतिरादित्य और दिग्विजय का मिलन केवल एक राजनीतिक दिखावा
भोपाल, सबकी खबर।
कुछ दिनों पहले हमने एक दृश्य देखा। ज्योतिरादित्य सिंधिया मंच से उतरे और उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को का हाथ थामा और वह अपने साथ लेकर उन्हें मंच पर आ गए। यह दृश्य था एक निजी कार्यक्रम का। लेकिन इसकी खूब चर्चा हुई, खूब वाहवाही हुई। उसके बाद दिग्विजय सिंह का की बारी थी। वो ग्वालियर गए और उन्होंने वहां ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपने पुत्र की तरह कहा। तो सिंधिया ने कुछ किया वो बहुत चर्चा में आया। दिग्विजय सिंह ने कुछ कहा वो भी चर्चा में आया। लेकिन क्या यह इतना सामान्य है? क्या बर्फ पिघल रही है इनके रिश्तों के बीच में? या फिर यह सब सियासी स्टंट है। इस संबंध में सबकी खबर के एडिटर इन चीफ जो खुद चंबल से आते हैं और चंबल की इन राजघरानों की राजनीति को उन्होंने बहुत ही करीब से देखा हैं उनके 45 के साल के अनुभव में उनका साफ कहना है कि महाराजा और राजा कभी एक नहीं हो सकते हैं यह सिर्फ केवल एक राजनीतिक स्टंट है। मौका लगेगा एक दूसरे की टांग खींचने का ही काम करते थे। कर रहे हैं। करते रहेंगे। माधवराव के पिताजी और दिग्विजय सिंह के पिताजी उनमें कभी नहीं पटी। दिग्विजय सिंह माधवराव में कभी नहीं पटी और जयवर्धन और ज्योतिरादित्य में भी कभी नहीं पटेगी। इन दो परिवारों में यह जो दुश्मनियां हैं, यह नीतिगत दुश्मनियां हैं। पुरानी दुश्मनियां हैं। अब ये राजनीति के लिए दो चेहरे हैं। नेता हमेशा दो चेहरे बनाता है। एक व्यक्तिगत जिंदगी का और एक राजनीति का। ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़ रहे थे और उनकी कमलनाथ से पटरी नहीं बैठ रही थी तो देश की एक बड़ी अखबार मालकिन ने दिल्ली में एक कार्यक्रम रखा था इनका एका कराने के लिए तो भोजन पर कमल नाथ थे भोजन पर सिंधिया थे उस परिवार के लोग थे एक दो लोग और कॉमन फ्रेंड थे उसमें और वहां झगड़ा इतना बढ़ा और बीच में से सिंधिया नाराज होके गए थे और यह किस्सा ऐसा है जिसने प्रदेश की राजनीति को ही पलट दिया। कमलनाथ की सरकार चली गई। उस घटना का ही था जहां कमल नाथ ने कहा था कि ठीक है जो करना है कर लो आप सड़क पर उतर जाओ। ज्योतिरादित्य सिंधिया का यह मानना है ये कमल नाथ गर्रा रहे थे। दिग्विजय सिंह गर्रा रहे थे। उन्होंने दिग्विजय सिंह को लेके जो जो कहा है वह सब उसमें है। पूरा के पूरा सोशल मीडिया पर डला हुआ है पूरा। तो इन दोनों के बीच में कभी एका नहीं हो सकता है। हां मैं यह मान सकता हूं कि पब्लिक को दिखाने के लिए एक राजनीतिक जो फुटेज लेने वाली बात है ना कि हम कैसे अपर हैंड बनाए रखें। तो उन्होंने बड़ी सद्भावना दिखा दी सार्वजनिक रूप से ज्योतिरादित्य ने दिग्विजय सिंह का हाथ पकड़ के मंच पे ले गए। दिग्विजय सिंह ने भी ग्वालियर में कह दिया मेरे पुत्रवत है लेकिन पुत्रवत कहना और पुत्रवत होने में जमीन आसमान का अंतर है। जिस तरह से दिग्विजय सिंह को ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक घेरते रहे हैं और कहीं ना कहीं उनके क्षेत्र में जाकर जयवर्धन सिंह भी बहुत कुछ करते रहे हैं। दोनों का राजनीतिक का वो जो क्षेत्र है वो भी तकरीबन एक जैसा ही है। राजा और महाराजा हैं विरासतें हैं और यह विरासतों की अदावतें जो है आने वाले वक्त में भी दिखेगी। सिंधिया और सिंधिया राजघराना और राघौगढ़ एक जो एक कहना चाहिए छोटी स्टेट थी वो इन दोनों के बीच में कभी पटरी नहीं बैठी है। यह लोग पुश्तैनी दुश्मनियों को बड़ा सहेज के रखते हैं और आसानी से भूलते नहीं है और बिल्कुल यह बात सत्य है कि माधवराव सिंधिया को कभी सीएम नहीं बनने दिया तो उसमें अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह की बहुत बड़ी भूमिका थी। दिग्विजय सिंह 10 साल चीफ मिनिस्टर रहे। उन्होंने दिखावा पूरा किया कि मैं तो बहुत छोटा हूं। जब सिंधिया आते थे तो मुझे याद है जब ये माधवराव सिंधिया के सामने आते थे अपने जेब से एक रुमाल निकालते थे। रुमाल को अपने हाथ पे ऐसे बिछाते थे। फिर 500 का नोट निकाल के उस पे रख के और ऐसे देते थे उनको। तो यह यह दिखाने की थी कि हम छोटे हैं। हम आपके सामने उपहार भेंट कर रहे हैं। ये छोटे राजा बड़े राजाओं को जो देते हैं ना ये सारी चीजें दिग्विजय सिंह करते रहे हैं। जब माधवराव का निधन हुआ तब तीन दिन दिग्विजय सिंह ने चप्पल नहीं पहनी थी और तीन दिन ग्वालियर में रहे। मतलब ऐसा लग रहा था कि उनके घर में शोक हो गया है। तो दिग्विजय सिंह ने बहुत सारे रिश्तों को निभाने की कोशिश जरूर की है। लेकिन यह सब दिखावा है। दिग्विजय सिंह का हो या सिंधिया परिवार का हो ये दिखावा करने में पीछे नहीं रहते लेकिन अंदर से जो इनमें दीवारें खींची हुई हैं। ये दीवारें टूटने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिखती। लेकिन इसमें लोकलाज तो दिखता है और लोकतंत्र की मर्यादाएं भी दिखती हैं इन सब चीजों में जो आमने सामने दिखता है पीठ पीछे तो दोनों एक दूसरे के छुरा लेके खड़े रहते हैं लेकिन ये जो लेकिन ये अच्छा एक काम करिए दिग्विजय सिंह की अनुपस्थिति में सिंधिया के बयान सुन लीजिए वो क्या बोलते हैं। सिंधिया की अनुपस्थिति में इनका बयान सुन लीजिए क्या बोलते हैं। ये राजनीति बड़ी मौका परस्त है अटेर के उपचुनाव में शिवराज सिंह चौहान जब उपचुनाव का प्रचार करने गए थे तो उन्होंने कहा था कि गद्दार सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी। यही शिवराज सिंह चौहान जब वह ज्योतिरादित्य सिंधिया बीजेपी में आए तो शिवराज सिंह ने कहा क्या कहा? एक विभीषण आ गया हमारे पास। उसके बाद में दोनों एक हो गए। शिवराज जी के बेटे की शादी में डांस कर रहे थे सिंधिया । तो ये राजनीति में दोस्त और दुश्मन कब दोस्त दुश्मन बन जाए कब दोस्त। लेकिन मैं सिंधिया और राघौगढ़ परिवार के बारे में कह सकता हूं। इनकी दुश्मनियां जो है इनको खत्म करने में तो और पीढ़ियां लगेगी। बिल्कुल माफ करो महाराज से शुरू हुई जो सियासत है वह विभीषण तक गई थी। हां ये अलग बात है कि माफ़ करो जब वो कह रहे थे तब शिवराज सिंह मुख्यमंत्री नहीं बन पाए लेकिन विभीषण में वो मुख्यमंत्री बन गए थे। दिग्विजय सिंह पर यह आरोप लगते रहे। इसके साथ-साथ कई तरह की जो सियासत है, कई तरह की जो वजह हैं वहां और आखिर सरकार तो गिर ही गई और सरकार गिरने का नुकसान सबसे ज्यादा कमलनाथ को हुआ। लेकिन कमलनाथ भी इसको नहीं संभाल पाए। रास्ता नकुल नाथ के लिए उतना बेहतर नहीं है। लेकिन जयवर्धन के लिए एक रास्ता अभी भी खुला हुआ है। तो आप क्या देखते हैं कि दिग्विजय सिंह ने सारे मोहरे खुद से फिट कर दिए थे। इस तरह से। देखिए यह बात तो तय है कि माधवराव ने अपने बेटे के लिए रास्ता बनाया। सिंधिया में अपनी काबिलियत है और जयवर्धन सिंह में अपनी काबिलियत है। कोई किसी की कृपा से आगे नहीं बढ़ता। कमलनाथ ने इतने प्रयास कर लिए। उनके बेटे सफल नहीं हुए तो नहीं हुए। वो बैठ गए घर लोगों से मिलते जुलते तक भी नहीं है। पिता कितनी भी कोशिश कर लें लेकिन बेटे में भी तो करंट होना चाहिए थोड़ा बहुत। वहां तो बिल्कुल करंट दिखाई नहीं देता कमल नाथ के। तो ये ठीक है। मैं पुनः कहूंगा कि जयवर्धन सिंह में खुद का अपना इतनी लायकियत है और सिंधिया में खुद का अपना इतना ओहरा है। इन दोनों ने जो स्थान बनाया वह खुद स्वयं बनाया है। थोडा बहुत इनके पीताओं का योगदान रहा होगा। सियासत राजा और महाराजा के बीच में है। अदावत बहुत पुरानी है। लेकिन कुछ इस तरह के दृश्य कई बार संतोष देते हैं। इसलिए कि देश की राजनीति में लोकतंत्र में सफोकेशन बहुत बढ़ गया है। लोग एक दूसरे के जानी दुश्मन की तरह कई बार बिहेव करते हैं जो पहले नहीं था। सौजन्यता धीरे-धीरे खत्म हो रही है। लेकिन जब इस तरह के दृश्य दिखते हैं तो मन को बहुत तसल्ली भी मिलती है। सियासत में क्या होगा यह अलग बात है। लेकिन दिल मिले ना मिले हाथ मिलाते रहिए। यह तो कम से कम दिखना चाहिए।

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