घोर लापरवाही या 'अंडरटेबल खेल'? एक ही मामले में आईएएस की दो अलग-अलग रिपोर्ट ने मचाया सियासी भूचाल, ईओडब्ल्यू पहुुंची शिकायत!
भोपाल, सबकी खबर।
मध्य प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी और प्रशासनिक गलियारों से इस वक्त की बेहद सनसनीखेज और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। पन्ना के पूर्व कलेक्टर और वर्तमान में चंबल संभाग के कमिश्नर (2010 बैच के आईएएस) सुरेश कुमार एक बड़े विवाद में बुरी तरह घिर गए हैं। उनके खिलाफ आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ यानी ईओडब्ल्यू (EOW) में एक गंभीर और पुख्ता शिकायत दर्ज कराई गई है, जिसकी कॉपी इस वक्त 'सबकी खबर' के पास मौजूद है। मामला बेहद गंभीर इसलिए है क्योंकि आईएएस सुरेश कुमार पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने पन्ना कलेक्टर रहते हुए एक ही जाति प्रमाण पत्र की जांच के मामले में महज तीन महीने के भीतर दो बिल्कुल उलट रिपोर्ट सौंप दीं। पहली रिपोर्ट में जिन युवाओं को सामान्य वर्ग (राजपूत बागरी) का बताया गया था, वहीं दूसरी रिपोर्ट में रातों-रात ऐसा 'सियासी खेल' हुआ कि उन्हें अनुसूचित जाति (SC) का घोषित कर दिया गया। यह पूरा मामला राज्य वन सेवा से जुड़ा हुआ है। पन्ना जिले के रहने वाले दो अभ्यर्थियों— रजनी बागरी और टिंकू कुमार बागरी का चयन मध्य प्रदेश राज्य वन सेवा में एक बड़े और सम्मानीय पद पर हुआ था। इस चयन के बाद शिकायतें उठीं कि इन दोनों का चयन अनुसूचित जाति कोटे से हुआ है, जबकि ये मूल रूप से उस वर्ग में नहीं आते। इसके बाद वन विभाग के प्रमुख सचिव अशोक वर्णवाल ने पन्ना कलेक्टर से इस मामले की जांच रिपोर्ट मांगी थी। तत्कालीन कलेक्टर सुरेश कुमार ने 11 अप्रैल 2025 को अपनी पहली विस्तृत जांच रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में साफ तौर पर साक्ष्यों और बयानों का हवाला देते हुए लिखा गया था कि ये दोनों बागरी समाज के तो हैं, लेकिन अनुसूचित जाति में नहीं आते। यानी इस रिपोर्ट के आधार पर दोनों की नौकरी जाना बिल्कुल तय माना जा रहा था। पर असली खेल यहीं से शुरू होता है। इसके बाद मंत्रालय से दोबारा जांच के लिए एक और पत्र भेजा जाता है। इस पुनरीक्षण के नाम पर मात्र 48 घंटे के भीतर एक ऐसा चमत्कार हुआ जो प्रशासनिक इतिहास में बिरला ही देखने को मिलता है। प्रमुख सचिव का पत्र 3 जुलाई को भोपाल से चलता है और 5 अगस्त 2025 को कलेक्टर पन्ना की दूसरी रिपोर्ट भी आ जाती है, जिसमें पुरानी रिपोर्ट के सारे तथ्यों को पलटते हुए दोनों को अनुसूचित जाति का घोषित कर दिया जाता है। भोपाल से पन्ना की दूरी, डाक का पहुंचना, जांच होना और नई रिपोर्ट तैयार होना— यह सब इतनी बिजली की रफ्तार से हुआ कि अब इस पर 'अंडरटेबल लेनदेन' और बड़े राजनीतिक दबाव के संगीन आरोप लग रहे हैं। इस पूरे फर्जीवाड़े के खिलाफ मध्य प्रदेश कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने न सिर्फ ईओडब्ल्यू (EOW) बल्कि सेंट्रल विजिलेंस कमिशन (CVC), राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और डीओपीटी (DoPT) तक में इस मामले की शिकायत दर्ज कराई है। प्रदीप अहिरवार ने साफ चेतावनी दी है कि यदि एक महीने के भीतर इस लापरवाह और दोषी आईएएस के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो वे सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे। उनका आरोप है कि बुंदेलखंड और बघेलखंड क्षेत्र में पाए जाने वाले राजपूत बागरी समाज के लोग फर्जी तरीके से मूल दलितों और आदिवासियों का हक मार रहे हैं, जिस पर बड़े अधिकारियों का वरदहस्त है। इस खुलासे के बाद मध्य प्रदेश में फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर नौकरी पाने वाले कई अन्य रसूखदारों और अफसरों में हड़कंप मच गया है। शिकायतकर्ता का दावा है कि वल्लभ भवन और विंध्याचल जैसे बड़े प्रशासनिक केंद्रों में अगर निष्पक्ष जांच हो जाए, तो 25 से 30 फीसदी अधिकारी फर्जी निकलेंगे। फिलहाल इस मामले में प्रथम दृष्टया कागजी सबूत इतने पुख्ता हैं कि चंबल कमिश्नर सुरेश कुमार की मुश्किलें बेहद बढ़ने वाली हैं। देखना होगा कि ईओडब्ल्यू इस हाईप्रोफाइल मामले में क्या रुख अपनाती है और सरकार अपने दागी अफसरों को बचाती है या फिर मूल अनुसूचित जाति वर्ग को उनका असली हक दिलवाती है।

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