डिग्री नहीं, भविष्य बिक रहा है! श्री कृष्णा यूनिवर्सिटी के बहाने एमपी के 'शिक्षा माफिया' मॉडल का पर्दाफाश; सिस्टम की चुप्पी पर बड़े सवाल
छतरपुर।
मध्यप्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सवाल सिर्फ एक निजी विश्वविद्यालय या कुछ संस्थानों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर हैं। छतरपुर स्थित श्री कृष्णा यूनिवर्सिटी और उससे जुड़े शैक्षणिक समूह को लेकर जो आरोप सामने आ रहे हैं, वे अगर सही साबित होते हैं तो यह सिर्फ अनियमितता या भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में गहरे पैठ चुके एक संगठित नेटवर्क की कहानी हो सकती है। आरोप हैं कि शिक्षा के नाम पर वर्षों से फर्जीवाड़ा, अवैध डिग्रियों का कारोबार, कागज़ी संस्थानों का संचालन, फर्जी निरीक्षण, स्कॉलरशिप घोटाले और प्रशासनिक संरक्षण के सहारे एक पूरा “शिक्षा माफिया मॉडल” खड़ा किया गया।
बताया जा रहा है कि इस शैक्षणिक समूह ने साधारण स्कूल भवनों और सीमित संसाधनों को कागजों पर विश्वविद्यालय और कॉलेजों के रूप में प्रस्तुत कर मान्यताएं हासिल कीं। आरोप यह भी हैं कि कई संस्थान जमीन पर कभी अस्तित्व में ही नहीं थे, लेकिन कागजों में छात्रों का दाखिला, शिक्षकों की नियुक्ति, पढ़ाई और परीक्षा सब चलती रही। इसे “घोस्ट यूनिवर्सिटी” और “घोस्ट कॉलेज” मॉडल कहा जा रहा है। गंभीर आरोप यह भी हैं कि फर्जी निरीक्षण रिपोर्ट और कथित मिलीभगत के जरिए इन संस्थानों को मान्यता दिलाई गई, और फिर इन्हीं के आधार पर डिग्रियां जारी की जाती रहीं। सवाल यह है कि अगर यह सब हो रहा था तो नियामक एजेंसियां, विश्वविद्यालय प्रशासन और उच्च शिक्षा विभाग इतने वर्षों तक चुप क्यों रहे?
इस पूरे प्रकरण में अवैध डिग्रियों के कथित गोरखधंधे ने मामले को और गंभीर बना दिया है। आरोप है कि इस नेटवर्क से जुड़े दलाल डिग्री बनवाने और बेचने का काम कर रहे थे और उनका संबंध श्री कृष्णा यूनिवर्सिटी से जुड़े लोगों तक जाता है। उत्तरप्रदेश में इस कथित डिग्री रैकेट को लेकर दो एफआईआर दर्ज होने और एसआईटी जांच के दावों ने इस विवाद को और बड़ा बना दिया है। आरोप यह भी हैं कि इसी नेटवर्क से जुड़े एक कथित बिचौलिए की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई, जिसने कई और सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर जांच में यह कड़ियां जुड़ती हैं, तो मामला केवल शैक्षणिक अनियमितताओं का नहीं, बल्कि संगठित आपराधिक साजिश तक पहुंच सकता है।
आरोप सिर्फ डिग्री बेचने तक सीमित नहीं हैं। कहा जा रहा है कि इस समूह के कुछ संस्थानों में फर्जी छात्र दिखाकर स्कॉलरशिप योजनाओं के जरिए करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन की लूट की गई। बिना पर्याप्त बिल्डिंग, फैकल्टी और संसाधनों के कॉलेजों को संचालित दिखाया गया। भोपाल और छतरपुर से जुड़े ऐसे संस्थानों का भी जिक्र सामने आता है जो कथित तौर पर सिर्फ कागजों में चलते रहे। यहां तक आरोप हैं कि एक “अस्तित्वहीन” कॉलेज को बाद में दूसरे जिले में शिफ्ट और मर्ज तक कर दिया गया। अगर यह सच है तो यह केवल नियामकीय विफलता नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर गहरी सांठगांठ की ओर संकेत करता है।
इस बीच हाल में एनसीटीई द्वारा यूनिवर्सिटी और उससे जुड़े पांच कॉलेजों के ट्रांजिशन आवेदन निरस्त किए जाने को भी इस पूरे विवाद के संदर्भ में देखा जा रहा है। इसे कई लोग इस बात का संकेत मान रहे हैं कि संस्थानों की कार्यप्रणाली और वैधता को लेकर गंभीर प्रश्न मौजूद हैं। हालांकि अब बड़ा सवाल यह है कि जब शिकायतें वर्षों से होने की बात कही जा रही है, जब सबूत दिए जाने के दावे हैं, जब दूसरे प्रदेश की एजेंसियां कार्रवाई करती दिख रही हैं, तब मध्यप्रदेश के जिम्मेदार विभागों और नियामक संस्थाओं ने क्या किया? क्या शिकायतों को दबाया गया? क्या कार्रवाई रोक दी गई? या फिर संरक्षण का आरोप सही है? यही सवाल अब चर्चा के केंद्र में है। इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा राजनीतिक और नैतिक सवाल श्री कृष्णा यूनिवर्सिटी के प्रस्तावित दीक्षांत समारोह को लेकर उठ रहे हैं। जिन संस्थानों पर इतने गंभीर आरोप हों, जहां अवैध डिग्री, फर्जीवाड़े और शिक्षा माफिया जैसे आरोप चर्चा में हों, वहां अगर बड़े माननीय मुख्य अतिथि बनकर पहुंचते हैं तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह महज औपचारिक उपस्थिति है या विवादों के बीच एक तरह का मौन समर्थन? जनता पूछ रही है—क्या समारोह में जाने वाले जिम्मेदार इस पूरे मामले में कार्रवाई की बात करेंगे या चुप्पी साधेंगे? आरोप यहां तक हैं कि इस पूरे नेटवर्क को कुछ प्रभावशाली लोगों और भ्रष्ट अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त रहा, जिसके चलते शिकायतें फाइलों में दबती रहीं। विरोध करने वालों को कथित तौर पर फंसाने की साजिशों तक के आरोप लगाए जा रहे हैं। अगर यह सच है तो यह सिर्फ शिक्षा के नाम पर भ्रष्टाचार नहीं बल्कि व्यवस्था पर गंभीर हमला है। क्योंकि यहां सवाल सिर्फ एक यूनिवर्सिटी का नहीं, लाखों छात्रों के भविष्य, डिग्री की विश्वसनीयता और देश की शिक्षा प्रणाली की साख का है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर डिग्रियां बिकेंगी, अगर घोस्ट कॉलेज चलेंगे, अगर फर्जी निरीक्षण होंगे, अगर स्कॉलरशिप लूटी जाएगी, और अगर सिस्टम खामोश रहेगा, तो देश का भविष्य कौन सुरक्षित करेगा? क्या यह पूरा मामला स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के दायरे में आएगा? क्या जिम्मेदार अधिकारियों, प्रबंधन और कथित संरक्षकों की भूमिका की जांच होगी? क्या दीक्षांत समारोह से पहले इन सवालों का जवाब मिलेगा?
आज जनता की निगाहें सिर्फ इस यूनिवर्सिटी पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर हैं। यह मामला अब सिर्फ भ्रष्टाचार का आरोप नहीं, जवाबदेही की मांग बन चुका है। सवाल सीधा है—क्या शिक्षा के नाम पर चल रहे इस कथित माफिया तंत्र पर कार्रवाई होगी, या फिर दीक्षांत समारोह की चमक इन सवालों को दबा देगी? क्योंकि अगर आज इन सवालों पर आवाज नहीं उठी, तो कल सिर्फ डिग्रियां नहीं, भविष्य बिकेगा।

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