"मिट्टी हमारी, नदी हमारी... तो मनमानी तुम्हारी क्यों? छतरपुर-पन्ना में जल सत्याग्रह की गूंज; 25 लाख मुआवजे और नए सर्वे पर बनी सहमति।"
छतरपुर/पन्ना ।
बुंदेलखंड की प्यास बुझाने का दावा करने वाली 'केन-बेतवा लिंक परियोजना' अब जल और जमीन की जंग में तब्दील हो चुकी है। छतरपुर और पन्ना के जंगलों से उठी विरोध की चिंगारी अब एक राष्ट्रीय आंदोलन बन गई है। बुधवार को आदिवासियों और किसानों ने 'पंचतत्व सत्याग्रह' के जरिए शासन और प्रशासन की चूलें हिला दीं। आंदोलन का मंजर इतना खौफनाक और भावुक था कि मौके पर मौजूद अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। आदिवासियों ने जल, मिट्टी, अग्नि, वायु और उपवास को हथियार बनाया। केन नदी की लहरों के बीच 'जल सत्याग्रह' हुआ, तो जमीन पर 'मिट्टी सत्याग्रह'। पूरे गांव ने एक साथ भूखे रहकर संदेश दिया कि अगर घर उजड़ेंगे, तो चूल्हे कभी नहीं जलेंगे। सबसे दहला देने वाला दृश्य तब दिखा जब 5 आंदोलनकारियों ने गले में फंदा डालकर 'सांकेतिक फांसी' लगाई। यह विस्थापन के खिलाफ उनकी आखिरी चेतावनी थी।
प्रशासन ने घुटने टेके, पर क्या वादे पूरे होंगे?
हजारों की भीड़ और 'जय किसान' संगठन के नेता अमित भटनागर के नेतृत्व में बढ़ते दबाव के बाद छतरपुर और पन्ना के आला अधिकारी मौके पर पहुंचे। लंबी खींचतान के बाद कुछ अहम बिंदुओं पर सहमति बनी। वर्तमान ₹12.5 लाख की मुआवजा राशि को बढ़ाकर ₹25 लाख करने पर चर्चा हुई। विवादित पुराने अधिकारियों को हटाकर अब एसडीएम और डिप्टी कलेक्टर स्तर के बाहरी अधिकारी 7 दिनों के भीतर नया सर्वे करेंगे। कट-ऑफ डेट को अप्रैल 2026 तक बढ़ाने पर विचार हो रहा है ताकि कोई भी परिवार हक से वंचित न रहे। विस्थापित आदिवासी महिलाओं के लिए विशेष पैकेज और सुविधा युक्त नए गांव बसाने का आश्वासन दिया गया है।
अस्तित्व की लड़ाई: "मिट्टी हमारी, नदी हमारी... मनमानी नहीं चलेगी"
भले ही प्रशासन ने आश्वासन की पुड़िया थमा दी है, लेकिन आंदोलनकारियों का गुस्सा शांत नहीं हुआ है। उनका कहना है कि "लिखित आश्वासन तो पहले भी बहुत मिले, अब फैसला जमीन पर चाहिए।" एक तरफ सरकार इसे बुंदेलखंड की 'जीवन रेखा' कह रही है, वहीं दूसरी तरफ पन्ना टाइगर रिजर्व की जैव-विविधता और हजारों आदिवासियों का अस्तित्व दांव पर है। क्या विकास की कीमत इन लोगों के घरों को उजाड़कर ही चुकाई जाएगी? यह सिर्फ बांध का विरोध नहीं है, यह अपनी जड़ों को बचाने की वो जंग है जिसे बुंदेलखंड का आदिवासी अब अंतिम सांस तक लड़ने को तैयार है।

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