छतरपुर।
छतरपुर  में एक आरक्षक की आत्महत्या के बाद अब पुलिस विभाग के भीतर का दर्द और नाराजगी सोशल मीडिया पर खुलकर सामने आ गई है। एक पुलिसकर्मी ने  लंबी भावुक पोस्ट लिखी है। जिसमें उसने विभाग के भीतर “सम्मान में भेदभाव”, मानसिक तनाव, छुट्टी की समस्या, ट्रांसफर-सस्पेंशन की राजनीति और छोटे कर्मचारियों की उपेक्षा को लेकर सवाल उठाए हैं। दरअसल  मामला उस पुलिसकर्मी से जुड़ा है जिसने नौगांव की पुरानी चौकी में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। आरक्षक तरुण गंधर्व की मौत ने पूरे पुलिस महकमे को झकझोर दिया, उसकी मौत से टूटे उसके दोस्त हरदेव कुशवाहा ने पुलिस विभाग में भेदभाव और अपमान को लेकर वो पोस्ट किया जो वायरल हो गया है।
थाना नौगांव के आरक्षक हरदेव कुशवाहा ने लिखा है.

PunjabKesari
एक साल पहले जब छतरपुर कोतवाली के टीआई अरविंद कुजूर ने आत्महत्या की थी, तब उन्हें पूरे सम्मान के साथ ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दिया गया था। जिले के बड़े अधिकारी मौजूद रहे थे, लेकिन इस बार एक आरक्षक के शव को “पॉलीथिन में लपेटकर बॉक्स में घर भेज दिया गया।”
क्या उसने खाकी नहीं पहनी थी? क्या उसके माथे पर अशोक चिन्ह नहीं था? क्या आरक्षक की कोई औकात नहीं?” “छोटे कर्मचारी की सुनवाई नहीं होती”
लिखा गया कि यदि कोई कर्मचारी अपनी समस्या लेकर अधिकारियों के पास जाता है तो घंटों इंतजार करना पड़ता है। वहीं थाने से लगातार ड्यूटी पर लौटने के फोन आते रहते हैं।
आरक्षक ने ट्रांसफर, सस्पेंशन और अटैचमेंट की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। आरोप लगाया कि कई बार बिना जांच के कार्रवाई कर दी जाती है। इससे कर्मचारियों और उनके परिवार पर मानसिक दबाव बढ़ता है।
छुट्टी तक के लिए “झूठ” बोलने की मजबूरी
पोस्ट में दर्द लिखते हुए आरक्षक ने कहा है कि  पुलिसकर्मियों को जरूरत के मुताबिक छुट्टी नहीं मिलती। इसी कारण कई कर्मचारी वास्तविक कारण छिपाकर काल्पनिक वजह लिखने को मजबूर हो जाते हैं।
अपराधियों पर कार्रवाई से पहले देखना पड़ता है राजनीतिक संबंध
आरक्षक ने विभाग में चाटुकारिता और बड़े लोगों के प्रभाव का भी जिक्र किया है। मजबूरी के जिक्र करते हुए कुशवाहा ने लिखा है कि अपराधियों पर कार्रवाई करने से पहले भी यह देखना पड़ता है कि कहीं उनके राजनीतिक संबंध तो नहीं हैं, ये सब देखना पड़ता है,  वरना कार्रवाई करने वाले कर्मचारी का ट्रांसफर तय माना जाता है।