70 साल बनाम 12 साल: कर्ज के जाल में फंसा देश! कुणाल चौधरी ने प्रधानमंत्री की अपील को बताया 'मानसिक गुलामी'
भोपाल, सबकी खबर।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'देशभक्ति' वाली अपील ने देश में एक नई बहस छेड़ दी है, लेकिन इस बार सवाल विपक्ष से ज्यादा आम आदमी के डर और सरकार के भीतर के विरोधाभासों पर है। सबकी खबर के साथ हुए एक पॉडकास्ट में कांग्रेस नेता कुणाल चौधरी ने इस मुद्दे पर तीखा प्रहार करते हुए इसे जनता के साथ 'मानसिक छलावा' करार दिया।
क्या त्याग और देशभक्ति की सारी जिम्मेदारी सिर्फ गरीबों की हैं...
हैदराबाद की रैली से पीएम मोदी ने 140 करोड़ देशवासियों से अपील की कि वे सोना न खरीदें, विदेश यात्रा टाल दें और पेट्रोल-डीजल का कम से कम उपयोग करें। उन्होंने इसे संकट के समय में सच्ची देशभक्ति बताया। लेकिन कुणाल चौधरी ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब पीएम यह अपील कर रहे थे, उसी वक्त भाजपा के नेता सैकड़ों गाड़ियों के काफिले के साथ शक्ति प्रदर्शन कर रहे थे। भोपाल में पाठ्यपुस्तक निगम के अध्यक्ष का 200 से 700 गाड़ियों के साथ पदभार ग्रहण करने पहुंचना और असम में 20 विमानों का उतरना क्या ईंधन की बर्बादी नहीं है? क्या त्याग और देशभक्ति की सारी जिम्मेदारी सिर्फ गरीब और मध्यम वर्ग के कंधों पर है?
अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए जनता से 'त्याग' की उम्मीद
चौधरी ने चेतावनी दी कि अगर जनता ने सोना खरीदना बंद कर दिया, तो इस क्षेत्र से जुड़े करीब 5 करोड़ परिवारों का रोजगार छिन जाएगा। यह सिर्फ बड़े ज्वेलर्स की बात नहीं है, बल्कि गांव-गांव में बैठे छोटे कारीगरों, सेल्समैन और मजदूरों की रोजी-रोटी का सवाल है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने 12 वर्षों में देश पर कर्ज का बोझ 55 लाख करोड़ से बढ़ाकर 250 लाख करोड़ कर दिया है, और अब अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए जनता से 'त्याग' की उम्मीद की जा रही है।
'आर्थिक आपातकाल'
सबसे बड़ा डर 'आर्थिक आपातकाल' को लेकर है। कुणाल चौधरी ने कहा कि जिस तरह नोटबंदी के वक्त जनता को कतारों में खड़ा किया गया, आज वैसी ही स्थिति फिर बन रही है। राहुल गांधी ने पहले ही 'आर्थिक सुनामी' का अलर्ट दिया था, लेकिन सरकार ने तैयारी करने के बजाय सब कुछ अमेरिका और चंद पूंजीपतियों के भरोसे छोड़ दिया। सरकार की नीतियों ने पहले नोटबंदी से असंगठित क्षेत्र को मारा, फिर गलत जीएसटी से व्यापार तबाह किया और अब युद्ध का बहाना बनाकर आम आदमी के उपभोग पर पाबंदी लगाने की कोशिश हो रही है। अंत में, यह साक्षात्कार एक डरावनी हकीकत की ओर इशारा करता है कि देश की अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है। एक तरफ किसान 43 डिग्री तापमान में मंडियों में पिस रहा है, दूसरी तरफ सरकार 'जैविक खेती' के नाम पर खाद की कमी को छिपा रही है। कुणाल चौधरी का साफ मानना है कि आने वाले 365 दिन देश के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण होंगे और जनता को अब सरकार की 'अपीलों' के पीछे छिपे कड़वे सच को समझना होगा। यह समय सिर्फ राष्ट्रभक्ति के नारों का नहीं, बल्कि टूटती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए जवाबदेही तय करने का है।

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