भोपाल।
मध्य प्रदेश के सरकारी गलियारों में इन दिनों एक ऐसा 'यू-टर्न' चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसने सुशासन और पारदर्शिता के दावों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। मामला प्रदेश के वित्त विभाग और बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) से जुड़ा है, जहाँ महज 24 घंटे के भीतर ₹5000 करोड़ से जुड़े एक बेहद गंभीर आदेश को वापस ले लिया गया।
क्या है पूरा मामला?
संस्थागत वित्त संचालनालय (वित्त विभाग) के आयुक्त के हस्ताक्षर से 27 मार्च को एक कड़ा आदेश जारी किया गया। इस आदेश में कहा गया कि मुख्यमंत्री किसान योजना की लगभग ₹1551.98 करोड़ (करीब पौने दो हजार करोड़) की राशि, जिसे कृषि विभाग के विशिष्ट खाते में रखा जाना था, बैंक ने नियमों के विरुद्ध कहीं और ट्रांसफर कर दी।
आदेश में स्पष्ट लिखा था:
"बैंक के इस कृत्य से राज्य सरकार को 'अपूर्णनीय क्षति' (ऐसी हानि जिसकी भरपाई न हो सके) हुई है।" इस गंभीर लापरवाही के चलते बैंक ऑफ बड़ौदा को अगले 5 साल के लिए प्रदेश के सभी सरकारी विभागों, निगमों, मंडलों और विश्वविद्यालयों के लिए 'ब्लैकलिस्ट' कर दिया गया।
24 घंटे में 'हृदय परिवर्तन': थूक कर चाटने जैसी स्थिति?
हैरानी की बात तब हुई जब अगले ही दिन यानी 28 मार्च को आयुक्त महोदय ने एक और आदेश जारी किया। मात्र डेढ़ लाइन के इस नए आदेश में कहा गया कि बैंक से चर्चा हो गई है और उनका आवेदन प्राप्त होने के बाद ब्लैकलिस्टिंग का पुराना आदेश निरस्त किया जाता है। अब सवाल यह उठ रहा है कि जिस क्षति को विभाग ने 'अपूर्णनीय' बताया था, वह महज एक रात में कैसे ठीक हो गई? क्या बैंक के एक आवेदन मात्र से करोड़ों के गबन या लापरवाही की भरपाई हो गई?
उठ रहे हैं गंभीर सवाल:
वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र जैन ने इस पूरे मामले को 'ब्लैकमेलिंग का खेल' करार दिया है। उन्होंने कुछ प्रमुख बिंदुओं पर सरकार को घेरा है:
अधिकारियों का खेल

क्या यह आदेश केवल बैंक पर दबाव बनाने के लिए निकाला गया था?
मीडिया का दुरुपयोग
पहले खुद प्रेस नोट जारी कर बैंक को बदनाम किया गया, फिर चुपचाप आदेश वापस ले लिया गया।
जनता का पैसा
पौने दो हजार करोड़ की राशि के साथ हुए इस खिलवाड़ का असली जिम्मेदार कौन है?
इस '24 घंटे के चमत्कार' के पीछे क्या कोई बड़ा आर्थिक लेनदेन या 'ओबलाइज' करने का मामला है? मांग की जा रही है कि लोकायुक्त, EOW या ED जैसी एजेंसियों को इस मामले में वित्त विभाग के अधिकारियों से जवाब तलब करना चाहिए। मध्य प्रदेश की 9 करोड़ जनता यह जानने का हक रखती है कि उनके टैक्स के पैसे के साथ बैंकों और अधिकारियों के बीच क्या 'सांठगांठ' चल रही है। क्या मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और वित्त मंत्री (डिप्टी सीएम) जगदीश देवड़ा इस संदिग्ध मामले का संज्ञान लेंगे?