भोपाल, सबकी खबर। 
आज के दौर में जहाँ एक छोटा सा पार्षद भी 'फॉर्च्यूनर' और सुरक्षा घेरे के बिना चलना अपनी तौहीन समझता है, वहीं मध्य प्रदेश की राजनीति में एक ऐसा चेहरा भी है जो रसूख और पद की चकाचौंध से कोसों दूर है। हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और विधायक हेमंत खंडेलवाल की।
दिखावे के दौर में सादगी की मिसाल
सबकी खबर मे एक पॉडकॉस्ट मेें यह बात निकलकर आई कि हेमंत खंडेलवाल आज भी भोपाल की प्रोफेसर कॉलोनी में एक साधारण से फ्लैट में रहते हैं। हैरानी की बात यह है कि प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भी उन्होंने सरकारी बंगला लेने से साफ़ इनकार कर दिया। मुख्यमंत्री ने स्वयं उनसे बंगला लेने का आग्रह किया, लेकिन उन्होंने सहजता से मना कर दिया। इतना ही नहीं, सुरक्षा के लिए भेजे गए पुलिस गार्ड और फॉलो गाड़ियों को भी उन्होंने यह कहकर लौटा दिया कि वे सादगी से रहना चाहते हैं।
टोल पर कतार और खुद का खर्च
राजनीति में अक्सर 'विधायक' का कार्ड दिखाकर टोल टैक्स बचाना आम बात है, लेकिन हेमंत खंडेलवाल यहाँ भी अलग हैं। वे अपनी गाड़ी का टोल खुद अपनी जेब से या फास्टैग (Fastag) के जरिए देते हैं। वे न तो हुटर का इस्तेमाल करते हैं और न ही अपने रसूख का प्रदर्शन।
विरासत में मिला अनुशासन
हेमंत जी कोई साधारण परिवार से नहीं हैं। उनके पिता विजय खंडेलवाल भाजपा के दिग्गज नेता थे जिन्होंने बैतूल को विकास की नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया। विरासत में संपन्नता होने के बावजूद हेमंत जी के व्यवहार में स्व. कुशाभाऊ ठाकरे जैसी सादगी झलकती है।
अनुशासन के मामले में 'कठोर'
भले ही वे दिखने में बेहद सरल और मृदुभाषी हैं, लेकिन संगठन की बात आने पर वे उतने ही सख्त भी हैं। जानकारों का कहना है कि उन्हें 'फ्लावर' समझने की गलती नहीं करनी चाहिए; अनुशासनहीनता होने पर वे कड़े निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते।
कार्यकर्ताओं के लिए सीख
इस खबर का मकसद राजनीति के गिरते स्तर के बीच एक अच्छे उदाहरण को सामने लाना है। यदि प्रदेश अध्यक्ष इतनी सादगी से रह सकते हैं, तो आम कार्यकर्ताओं और अन्य विधायकों को भी इस 'दिखावे की संस्कृति' को छोड़कर सादगी अपनानी चाहिए।