सिंधिया के 'सिपहसालारों' पर सियासी ग्रहण: सरकार बनाई, पर खुद 'बेघर' हो गए!
ग्वालियर/ भोपाल सबकी खबर।
मध्य प्रदेश की राजनीति में 2020 का वह मंजर सबको याद है, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया के एक इशारे पर कांग्रेस के दिग्गज विधायकों ने अपनी ही सरकार गिरा दी थी। भाजपा की सत्ता में वापसी कराने वाले वे 'महाराज के खास' आज 2026 में खुद के राजनीतिक वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं। ताज़ा निगम-मंडल नियुक्तियों ने यह साफ कर दिया है कि भाजपा के 'संगठनात्मक ढांचे' में सिंधिया समर्थकों के लिए जगह बनाना अब टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
पावर से 'पैवेलियन' तक: इन दिग्गजों के भविष्य पर सवाल
कभी सत्ता की धुरी रहने वाले ये नाम आज हाशिए पर नजर आ रहे हैं। महेंद्र सिसोदिया व ओपीएस भदौरिया जो कभी कैबिनेट मंत्री थे, आज न विधायक हैं और न ही किसी बोर्ड के अध्यक्ष। इमरती देवी व मुन्नालाल गोयल का चुनाव हारने के बाद पिछली बार तो पुनर्वास हो गया था, लेकिन इस बार हाथ खाली हैं।गिरिराज दंडोतिया, रणवीर जाटव, कमलेश जाटव ये वो नाम हैं जिन्होंने सिंधिया के लिए अपना राजनीतिक करियर दांव पर लगाया, लेकिन आज संगठन की मुख्यधारा से कटे हुए महसूस कर रहे हैं।
'महाराज' का कद बढ़ा, पर 'सेना' बिखरी?
वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा ने एक बहुत ही सूक्ष्म बिसात बिछाई है। सिंधिया कांग्रेस में 'छत्रप' थे, जहाँ उनकी मर्जी से नियुक्तियां होती थीं। भाजपा एक 'कैडर बेस्ड' पार्टी है, यहाँ "व्यक्ति" से बड़ा "विचार और संगठन" है।भाजपा सिंधिया का उपयोग एक राष्ट्रीय चेहरे के रूप में कर रही है। उनका कद तो बरकरार है, लेकिन उनके साथ आए नेताओं को भाजपा ने अपने सिस्टम में इस कदर मिला लिया है कि अब उनकी अलग 'सिंधिया खेमे' वाली पहचान खत्म की जा रही है। सिंधिया के धुर विरोधी रहे रामनिवास रावत जैसे नेताओं को भाजपा में अहम पद मिलना यह संकेत देता है कि अब ग्वालियर-चंबल में केवल सिंधिया की ही नहीं चलेगी।
भविष्य की डगर: क्या होगा इन पूर्व विधायकों का?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या ये नेता अब RSS की शाखाओं का रुख करेंगे? क्या संघ इन्हें अपनाएगा? जानकारों का कहना है कि संघ में 'त्याग' सर्वोपरि है, वहां पद मांगकर नहीं मिलता। ऐसे में इन नेताओं के पास सीमित विकल्प बचे हैं: संगठन की 'कार्यकारिणी' में महज एक सदस्य बनकर संतोष करना। अगले विधानसभा चुनाव तक जनता के बीच अपनी खोई हुई साख वापस पाना। "जिन हाथों ने मध्य प्रदेश की सत्ता का रुख पलटा था, आज वे हाथ संगठन में एक दस्तखत के लिए तरस रहे हैं। भाजपा ने साफ कर दिया है कि 'महाराज' तो हमारे हैं, पर उनका 'गुट' हमें मंजूर नहीं।"

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