लाइफलाइन नहीं, ये तो 'पार्टी लाइन' है: खाली डिब्बों में जश्न, घाटे में डूबा मेट्रो प्रशासन!
भोपाल।
मध्य प्रदेश की मेट्रो अब पब्लिक ट्रांसपोर्ट से ज्यादा "किराए का शामियाना" बनती नजर आ रही है। भोपाल और इंदौर में अरबों-खरबों रुपये के बजट को जमीन पर उतारने वाले अफसरों की दूरदर्शिता का आलम यह है कि जिस मेट्रो को शहर की लाइफलाइन बनना था, वह अब रीलबाजों और दूल्हा-दुलहनों के लिए फोटोशूट का बैकग्राउंड स्कोर बनकर रह गई है। मध्य प्रदेश मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (MPMRCL) ने 'सेलिब्रेशन्स ऑन व्हील्स' का जो नया शिगूफा छेड़ा है, वह साफ तौर पर इस बात की स्वीकारोक्ति है कि मेट्रो चलाने की प्लानिंग में एक बहुत बड़ा छेद रह गया था। अब जब डिब्बे खाली दौड़ रहे हैं और स्टेशनों पर सन्नाटा पसरा है, तो घाटे की भरपाई के लिए इसे इवेंट सेंटर में तब्दील किया जा रहा है।
क्या हुआ उन दावों का...
सवाल उन योजनाकारों से पूछा जाना चाहिए जिन्होंने प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करते वक्त बड़े-बड़े दावे किए थे कि मेट्रो आने से सड़कों पर गाड़ियां कम हो जाएंगी और जनता का कीमती वक्त बचेगा। आज हकीकत यह है कि जनता तो अपनी गाड़ियों से ही चल रही है, लेकिन मेट्रो के खाली कोच जरूर अब केक काटने और फोटो खिंचवाने के लिए बुक किए जा रहे हैं। क्या वाकई एक हाई-प्रोफाइल और बेहद संवेदनशील सिक्योरिटी जोन वाली जगह को पिकनिक स्पॉट बनाना एक समझदारी भरा फैसला है? जिस मेट्रो में आम आदमी की सुरक्षा के नाम पर दस जगह तलाशी ली जाती है, वहां अब कैमरों की फ्लैश चमकेगी और नाच-गाना होगा।
सरकारी दावों की विफलता का सर्टिफिकेट
यह सिर्फ एक पहल नहीं, बल्कि उन सरकारी दावों की विफलता का सर्टिफिकेट है जो मेट्रो को विकास का पर्याय बताते थे। जब यात्रियों से कमाई नहीं हुई, तो अब प्री-वेडिंग शूट और बर्थडे पार्टियों के सहारे बिजली बिल निकालने की नौबत आ गई है। अफसरों ने इसे "जीवंत संस्कृति" और "बदलती जीवनशैली" का नाम देकर बड़ी खूबसूरती से अपनी नाकामी को छिपाने की कोशिश की है। लेकिन कड़वा सच यही है कि अगर मेट्रो अपनी असली उपयोगिता यानी ट्रांसपोर्टेशन में सफल होती, तो उसे कमर्शियल इवेंट्स के लिए दर-दर भटकने की जरूरत नहीं पड़ती। अब आलम यह होगा कि ट्रेन में सफर करने वाला यात्री खुद को वीआईपी समझने के बजाय उन लोगों के बीच एक 'एक्स्ट्रा' महसूस करेगा जो वहां पार्टी मनाने आए हैं। कुल मिलाकर, एमपी की मेट्रो अब रफ़्तार की पहचान नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता किराए का हॉल बनकर रह गई है, जिसका असली मकसद अब पब्लिक सर्विस से हटकर सिर्फ राजस्व वसूली रह गया है।
'सेलिब्रेशन्स ऑन व्हील्स'
गौरतलब है कि MPMRCL ने 'सेलिब्रेशन्स ऑन व्हील्स' पहल के तहत, मेट्रो कोच और चुनिंदा स्टेशन क्षेत्रों का उपयोग विभिन्न रचनात्मक और सामाजिक गतिविधियों के लिए किया जाएगा, बशर्ते निर्धारित शुल्क और सुरक्षा नियमों का पालन किया जाए। MPMRCL के प्रबंध निदेशक एस. कृष्णा चैतन्य ने कहा, "सेलिब्रेशन्स ऑन व्हील्स पहल इंदौर और भोपाल की जीवंत संस्कृति, तेजी से बढ़ते शहरी वातावरण और नागरिकों की बदलती जीवनशैली को ध्यान में रखते हुए शुरू की गई है। उन्होंने कहा, "यह मेट्रो को जनता के करीब लाने का एक प्रयास है, जिससे लोग मेट्रो के सुरक्षित और आधुनिक वातावरण में अपने खास मौकों का जश्न मना सकें। इससे मेट्रो सेवाएं नागरिकों के दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग बन जाएंगी।"

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