"बीजेपी नेताओं के आगे घुटने क्यों टेकती है पुलिस?": प्रीतम लोधी विवाद पर पटवारी का बड़ा प्रहार
भोपाल।
मध्य प्रदेश की सियासत में 'वर्दी' के अपमान और विधायक की 'धमकी' का मुद्दा अब बड़े आंदोलन की शक्ल ले चुका है। पिछोर से भाजपा विधायक प्रीतम लोधी द्वारा एक एसडीओपी (IPS अधिकारी) को खुलेआम धमकाने के मामले में अब पीसीसी चीफ जीतू पटवारी ने मोर्चा खोल दिया है। पटवारी ने प्रदेश के पुलिसकर्मियों के नाम एक खुला पत्र लिखा है।
IPS को धमकाने की घटना ने देश को झकझोरा
जीतू पटवारी ने पुलिसकर्मियों को पत्र में लिखा- मध्यप्रदेश में हाल ही में बीजेपी विधायक प्रीतम सिंह लोधी द्वारा एक IPS अधिकारी को धमकी देने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह केवल एक व्यक्ति की भाषा या व्यवहार का मामला नहीं है, बल्कि यह उस खतरनाक माहौल का संकेत है जिसमें सत्ता का अहंकार कानून और संविधान पर हावी होता जा रहा है।
बीजेपी नेता खुलेआम पुलिस को डराने और अपमानित करते हैं
पटवारी ने आगे लिखा- मैं यह पत्र केवल एक घटना के संदर्भ में नहीं, बल्कि उस व्यापक स्थिति को ध्यान में रखते हुए लिख रहा हूं, जिसमें बार-बार ऐसे प्रसंग सामने आते हैं जहां BJP नेता खुलेआम पुलिस अधिकारियों को डराने, दबाव बनाने या अपमानित करने का प्रयास करते हैं। उससे भी ज्यादा चिंताजनक यह है कि इन घटनाओं के बाद पुलिस तंत्र की प्रतिक्रिया अक्सर बेहद सीमित, संयमित और कभी-कभी मौन ही रह जाती है।
पुलिस अफसरों से पूछा- आवाज धीमी क्यों पड़ जाती है
पटवारी ने आगे लिखा- मेरा पुलिस अधिकारियों से एक सीधा सवाल है कि आखिर वह कौन-सी परिस्थितियां हैं, जिन्होंने देश के सबसे प्रशिक्षित, अनुशासित और साहसी अधिकारियों को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है? जब अन्याय के खिलाफ दहाड़ने की जरूरत होती है, तब आपकी आवाज धीमी क्यों पड़ जाती है? जब आम नागरिक सामने होता है, तब वही तंत्र इतना कठोर और आक्रामक कैसे हो जाता है? क्या यह सच नहीं है कि जब पुलिस निष्पक्ष और संविधान के दायरे में रहकर काम करती है, तब किसी भी नेता या प्रभावशाली व्यक्ति की हिम्मत नहीं होती कि वह उसे आंख दिखा सके, लेकिन जब वही पुलिस बीजेपी सरकार के अनैतिक कार्यों की संरक्षक बनती हुई दिखाई देती है, तब उसे दबाव भी झेलना पड़ता है और अपमान भी सहना पड़ता है।
आईपीएस एसोसिएशन के पत्र में आक्रोश कम विवशता ज्यादा
पटवारी ने आगे लिखा- मैंने IPS एसोसिएशन का पत्र भी पढ़ा। उस पत्र में आक्रोश कम और विवशता ज्यादा नजर आती है। यह एक मजबूत और स्वाभिमानी संस्था की आवाज नहीं, बल्कि एक ऐसे तंत्र की अपील प्रतीत होती है जो भीतर से दबाव में है। यह स्थिति केवल पुलिस के लिए नहीं, पूरे लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। क्योंकि यदि कानून लागू करने वाली संस्था ही असहाय दिखेगी, तो आम नागरिक का विश्वास किस पर टिकेगा? मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूं कि यह पत्र पुलिसकर्मियों के खिलाफ नहीं है। देश के लाखों पुलिसकर्मी दिन-रात अपनी जान जोखिम में डालकर काम करते हैं और उनकी कर्मठता और साहस को पूरा देश सलाम करता है। यह पत्र उन परिस्थितियों के खिलाफ है, जो आपको आपकी मूल भूमिका से दूर कर रही हैं।

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