दतिया विधायक की कुर्सी छिनी तो भड़की कांग्रेस; केके मिश्रा बोले- 'बीजेपी के लिए अलग और विपक्ष के लिए अलग है कानून'
भोपाल।
दतिया से कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता देर रात समाप्त किए जाने के बाद मध्य प्रदेश की सियासत में 'न्याय और नियम' की व्याख्या पर जंग छिड़ गई है। कांग्रेस के दिग्गज नेता और मीडिया सलाहकार केके मिश्रा ने इस पूरी कार्रवाई को आड़े हाथों लेते हुए व्यवस्था पर कड़ा प्रहार किया है।
"रुपया और कानून में गिरने की प्रतिस्पर्धा"
केके मिश्रा ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी भड़ास निकालते हुए लिखा कि वर्तमान दौर में देश में रुपया और मध्य प्रदेश में न्याय-कानून के बीच "गिरने की प्रतिस्पर्धा" चल रही है। उन्होंने भाजपा सरकार पर दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि पिछली विधानसभा में कांग्रेस छोड़ भाजपा में जाने वाले सचिन बिरला के मामले में पूरे 5 साल तक फैसला नहीं आया, लेकिन राजेंद्र भारती के मामले में कुछ ही घंटों के भीतर 'सर्जिकल स्ट्राइक' कर दी गई। मिश्रा ने बीना विधायक निर्मला सप्रे और विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा के उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि सत्ता पक्ष के अनुकूल होने पर फैसले लंबित रहते हैं, लेकिन विपक्ष के विधायकों को टारगेट करने के लिए आधी रात को विधानसभा सचिवालय खोल दिया जाता है।
क्या प्रहलाद लोधी की तरह पलटेगा पासा?
राजेंद्र भारती की सदस्यता जाने के बाद अब सियासी गलियारों में 'पवई विधायक प्रहलाद लोधी' वाले केस की चर्चा जोरों पर है।
क्या था लोधी केस: भाजपा विधायक प्रहलाद लोधी को तहसीलदार से मारपीट के मामले में 2 साल की सजा हुई थी, जिसके तुरंत बाद उनकी सदस्यता खत्म कर दी गई थी।
कैसे हुई वापसी: लोधी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहाँ सजा पर 'स्टे' मिलते ही उनकी विधायकी बहाल करनी पड़ी थी।
अब सवाल यह है कि क्या राजेंद्र भारती को भी ऊपरी अदालत से राहत मिलेगी? अगर हाईकोर्ट भारती की सजा पर रोक (Stay) लगा देता है, तो विधानसभा को अपना आदेश वापस लेना होगा।
बीजेपी बनाम कांग्रेस: दांव पर साख
जहाँ कांग्रेस इसे "संस्थाओं का दुरुपयोग" बता रही है, वहीं भाजपा का तर्क है कि वह केवल कानून का पालन कर रही है। भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि 2 साल से अधिक की सजा होने पर सदस्यता 'स्वतः' समाप्त होने का संवैधानिक प्रावधान है। हालांकि, कांग्रेस का तर्क है कि जब कोर्ट ने अपील के लिए 60 दिनों की मोहलत दी थी, तो सचिवालय को चंद घंटों की इतनी जल्दी क्या थी?

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