आबकारी विभाग में 'एक कंधा, तीन जिले'— 21,000 करोड़ के राजस्व के लक्ष्य को कैसे करेंगे पूरा...
भोपाल, सबकी खबर।
मध्य प्रदेश सरकार ने इस साल आबकारी से 21,000 करोड़ रुपये का भारी-भरकम राजस्व जुटाने का लक्ष्य रखा है। लेकिन हकीकत यह है कि विभाग खुद 'अटैचमेंट' और 'अतिरिक्त प्रभार' की बीमारी से जूझ रहा है। वरिष्ठ पत्रकार और आबकारी मामलों के विशेषज्ञ भुवन तोषनीवाल द्वारा मुख्य सचिव को लिखे पत्र ने विभाग की पोल खोल कर रख दी है।
बदहाली का गणित: एक एक अफसर के पास दो दो जिले
हैरानी की बात यह है कि एक तरफ कई अधिकारी मुख्यालयों में बिना किसी ठोस जिम्मेदारी के बैठे हैं या मेडिकल लीव का बहाना बनाकर आराम फरमा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कर्मठ अधिकारियों को 200 से 450 किलोमीटर दूर तक के जिलों का अतिरिक्त प्रभार थमा दिया गया है।
अव्यवहारिक नियुक्तियों के कुछ चौंकाने वाले उदाहरण
मनीष खरे: पोस्टिंग ग्वालियर मुख्यालय, लेकिन उड़नदस्ता संभाल रहे हैं इंदौर और देवास का (दूरी लगभग 450 किमी)।
शुभम दांगोड़े: शिवपुरी के साथ श्योपुर का प्रभार (दूरी 200 किमी)।
बेबा मरकाम: एक साथ तीन जिले— कटनी, सतना और मैहर।
अन्य: झाबुआ-अलीराजपुर, उज्जैन-शाजापुर और सागर-टीकमगढ़ जैसे महत्वपूर्ण जिले भी 'एक ही भरोसे' चल रहे हैं।
राजस्व और सुरक्षा पर खतरा
जब एक ही अधिकारी तीन जिलों की फाइलें देखेगा, तो वह अवैध शराब की तस्करी कैसे रोकेगा? ठेकेदारों का भरोसा कैसे जीतेगा? चर्चा में सही मुद्दा उठाया गया कि जैसे एक जिले में दो कलेक्टर या दो एसपी का प्रभार नहीं होता, वैसे ही आबकारी जैसे संवेदनशील विभाग में यह 'प्रयोग' क्यों?
बड़ा सवाल.. मलाईदार जिलों में ही ज्यादा खेल
क्या सरकार वाकई राजस्व चाहती है या सिर्फ चहेते अधिकारियों को 'मलाईदार' जिलों का दोहरा-तिहरा प्रभार सौंपकर व्यवस्था से समझौता कर रही है? यदि समय रहते खाली पड़े पदों पर नियमित नियुक्तियां नहीं की गईं या स्थानीय सहायक आबकारी अधिकारियों (ADO) को प्रभार नहीं सौंपा गया, तो 21,000 करोड़ का यह सपना महज एक आंकड़ा बनकर रह जाएगा।

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