भोपाल, सबकी खबर। 
"तालों में ताल भोपाल ताल, बाकी सब तलैया..." यह कहावत अब भोपाल के ऐतिहासिक बड़े तालाब के लिए एक कड़वी सच्चाई बनती जा रही है। शहर की लाइफलाइन और राजा भोज की विरासत आज भू-माफियाओं और 'सफेदपोश' अधिकारियों के लालच की भेंट चढ़ रही है।
30 साल में 10 किमी का तालाब गायब हो गया
सांसद आलोक शर्मा के ऑन-कैमरा कुबूलनामे ने प्रशासन की पोल खोल दी है। पिछले 30 वर्षों में तालाब की परिधि 10 किलोमीटर तक सिमट गई है। सवाल यह है कि जब 20 साल से प्रदेश में एक ही दल की सरकार है, तो तालाब को 'धीरे-धीरे' निगलने वाले ये रसूखदार कौन हैं?
टास्क फोर्स पर सवाल: 'रक्षक ही भक्षक?'
बरखेड़ी खुर्द जैसे लो-डेंसिटी और टाइगर मूवमेंट वाले इलाकों में पूर्व मुख्य सचिवों और वर्तमान संभाग आयुक्त (Divisional Commissioner) स्तर के अधिकारियों के बंगले बने होने के आरोप हैं।  प्रशासन ने 24 अवैध निर्माणों पर निशान लगाए हैं, लेकिन क्या एक नायब तहसीलदार में इतनी हिम्मत है कि वह पूर्व मुख्य सचिव (CS) के अवैध निर्माण पर बुलडोजर चला सके? टास्क फोर्स का गठन प्रशासन की इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की सख्ती और सामाजिक कार्यकर्ताओं की कानूनी लड़ाई का नतीजा है।
सियासत बनाम विरासत
तालाब का नाम 'भोजताल' रखने की सियासत तो खूब हुई, लेकिन इसके कैचमेंट एरिया में धड़ल्ले से बने मैरिज गार्डन, रेस्टोरेंट और वीआईपी कॉलोनियों ने इसकी सांसें रोक दी हैं। पूर्व मुख्य सचिवों पर तालाब में मिट्टी डालकर दीवारें खड़ी करने के गंभीर आरोप सार्वजनिक मंचों से लगाए जा रहे हैं। भोपाल ताल को बचाने के लिए अब केवल कागजी समितियों की नहीं, बल्कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। यदि मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव इस मामले में 'Zero Tolerance' की नीति नहीं अपनाते, तो आने वाली पीढ़ियां इस ऐतिहासिक धरोहर को केवल किताबों और पुराने गीतों में ही ढूंढ पाएंगी।