भोपाल। 
सूबे की राजनीति में इन दिनों एक फाइल का चर्चा विषय बनी हुई है। फाइल की बात करें तो यह फाइल किसी दिग्गज के काले कारनामों की एक लंबी फेहरिस्त की बताई जा रही है। मामला प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस और आजीविका मिशन के पूर्व CEO ललित मोहन बेलवाल के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच से जुड़ा है। हैरानी की बात यह है कि खुद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने विधानसभा में यह स्वीकार किया है कि पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग जांच के लिए जरूरी जानकारी साझा नहीं कर रहा है।
सबसे बडा सवाल, क्या है उस फाइल में  
मध्य प्रदेश के बहुचर्चित पोषण आहार घोटाले और टेक होम राशन (THR) में करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार के आरोप हैं। इस मामले में लोकायुक्त ने पूर्व मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस और ललित मोहन बेलवाल के खिलाफ शिकायत दर्ज की है। लोकायुक्त इस मामले की तह तक जाना चाहता है, लेकिन पिछले एक साल से जांच की गाड़ी 'लालफीताशाही' के बीच फंसी हुई है।
निशाने पर 3 महिला IAS अधिकारी
राजनीतिक जानकारों की मानें तो सीधे तौर पर विभाग की तीन शीर्ष महिला अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं, जिनमें दीपाली रस्तोगी (प्रमुख सचिव, पंचायत विभाग): आरोप है कि उनकी रुचि जांच को आगे बढ़ाने के बजाय आरोपी अधिकारियों को संरक्षण देने में है। वहीं जीवी रश्मि (सचिव) उन पर भी जानकारी रोकने के आरोप लग रहे हैं। हर्षिका सिंह (CEO, आजीविका मिशन): विभाग की कमान संभालते हुए भी जरूरी दस्तावेज लोकायुक्त को उपलब्ध न कराने का आरोप है।
भ्रष्टाचारी को बचाने सबकी मिलिभगत
आखिर प्रदेश की 9 करोड़ जनता की गाढ़ी कमाई से वेतन लेने वाले ये अधिकारी एक 'भ्रष्टाचार के आरोपी' पूर्व अफसर को क्यों बचा रहे हैं?
अजीब है... खुद मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि विभाग जानकारी नहीं दे रहा
विधानसभा में मुख्यमंत्री का यह कहना कि "विभाग जानकारी नहीं दे रहा", कई गंभीर सवाल खड़े करता है। CM सचिवालय की सख्ती कहाँ है? अगर विभाग के अधिकारी मुख्यमंत्री के आदेशों को ठेंगा दिखा रहे हैं, तो उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? लोकायुक्त खामोश क्यों? भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लोकायुक्त के पास छापे मारने और फाइलें जब्त करने के पर्याप्त अधिकार हैं। फिर पंचायत विभाग की फाइलों को जब्त करने के लिए 'सर्च वारंट' का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा?
भ्रष्टाचार की जड़ें और जनता का पैसा
आजीविका मिशन और पोषण आहार विभाग सीधे तौर पर प्रदेश के गरीबों और कुपोषित बच्चों से जुड़ा है। यहाँ हुआ भ्रष्टाचार सिर्फ कागजी हेराफेरी नहीं, बल्कि मासूमों के हक पर डाका है। मध्य प्रदेश की जनता आज जवाब मांग रही है कि क्या 'ईमानदार' कहे जाने वाले अधिकारी भी भ्रष्टाचार के सिंडिकेट का हिस्सा बन चुके हैं? अगर मुख्यमंत्री खुद सदन में विभाग की असहयोगिता की बात कह रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक अराजकता का संकेत है।