भोपाल। 
लंबे समय से विवादों में रही धार स्थित ऐतिहासक भोजशाला को लेकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण 'एएसआई' की तरफ से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में पेश रिपोर्ट सोमवार को पक्षकारों को सौंपी गई। इस रिपोर्ट पर दावे आपत्तियां देने के लिए दो सप्ताह का समय निर्धारित किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भोजशाला का निर्माण 12वीं सदी में हुआ था और कमाल मौला 1265 वीं ईस्वी में आया था। इस आधार पर याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि भोजशाला का निर्माण मालवा क्षेत्र में मुगलों के आगमन के पहले हो चुका था।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भोजशाला के सर्वे के लिए 11 मार्च 2024 को पुरातत्व विभाग को निर्देश दिए थे। इसके बाद विशेषज्ञों की टीम ने 98 दिन तक वैज्ञानिक सर्वे, जांच की। इसके लिए कई स्थानों पर खुदाई कर भी अवशेष देखे गए। उत्खनन के निर्देश दिए। एएसआई की टीम ने ग्राउंड पैनिट्रेटिंग रडार तकनीक से जमीन के भीतर की संरचनाओं का परीक्षण किया। खुदाई करके भी अवशेषों, दीवारों की संरचना, स्तंभों और शिलालेखों का अध्ययन किया गया। सर्वे में वास्तुशिल्पीय शैली, निर्माण सामग्री और काल निर्धारण पर विशेष ध्यान दिया गया।
संस्कृत व प्राकृत भाषा के शिलालेख
एएसआई की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार परिसर में मंदिर शैली की वास्तुकला के संकेत मिले हैं। कई स्तंभों पर नक्काशी, कमल आकृतियां और शिल्प अवशेष पाए गए। संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख भी दर्ज किए गए, जिनकी तिथि 12 वीं से 16 वीं शताब्दी के बीच की मानी गई है।
2100 पेज की रिपोर्ट
2100 पेज की इस रिपोर्ट में भोजशाला के सर्वे के दौरान खींची गई 500 से ज्यादा तस्वीरों की भी प्रमाण बतौर शामिल किया गया है। रिपोर्ट में यह तथ्य निकल कर आया कि भोजशाला का निर्माण 12 वीं शताब्दी में हुआ जबकि मालवा में कमाल मौला, का आगमन 1265 में हुआ। मुस्लिम पक्ष भोजशाला को कमाल मौला के नाम पर ही मस्जिद बताते हुए इस पर दावा कर रहा है। वहीं, हिंदूपक्ष इसे देवी सरस्वती का मंदिर मानते हुए इस पर अपना हक जता रहा है।
अभिलेख 12 से 16वीं सदी के
रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है कि भोजशाला मंदिर सह कमाल मौला मस्जिद परिसर में संस्कृत, प्राकृत तथा स्थानीय बोलियों में नागरी लिपि में लिखे गए अभिलेख 12वीं से 16वीं शताब्दी ईस्वी के बीच के माने जाते हैं। इनमें से कुछ महत्वपूर्ण अभिलेख जैसे पारिजातमंजरी-नाटिका, अवनिकूर्मशतम तथा नागबन्ध अभिलेख का परीक्षण किया गया है और उनका विस्तृत विवरण भारतीय पुरालेख काॅर्पस इंस्क्रिप्शनम इंडिकारम में किया गया है। एक विशाल अभिलेख, जिसमें पारिजातमंजरी-नाटिका व विजयश्री अंकित है, उसमें उल्लेख है कि यह कृति मदन द्वारा रचित है, जो धार के राजा अर्जुनवर्मन के गुरु (आचार्य) थे। अर्जुनवर्मन, सुभटवर्मन के पुत्र थे और परमार वंश से संबंधित थे, जो सम्राट भोजदेव के वंशज माने जाते हैं। प्रस्तावना के अनुसार, इस नाटक का प्रथम मंचन देवी सरस्वती (शारदा देवी) के मंदिर यानी भोजशाला में हुआ था।