भोपाल। 
जब देश की बिजली वितरण कंपनियां पहली बार मुनाफे में पहुंच चुकी हैं, उसी वक्त मध्य प्रदेश की बिजली व्यवस्था गहरे वित्तीय संकट में फंसी नजर आ रही है। केंद्र सरकार के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक 31 मार्च 2025 तक मध्य प्रदेश की बिजली वितरण कंपनियों पर 49,239 करोड़ रुपए का कर्ज चढ़ चुका है, जबकि वर्षों से जुड़ते घाटों का आंकड़ा 71,394 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। यह जानकारी राज्यसभा में बिजली राज्य मंत्री श्रीपाद नाइक ने दी।
देश आगे बढ़ा, मप्र पीछे क्यों?
वित्तीय वर्ष 2024-25 में देश की डिस्कॉम ने 2,701 करोड़ रुपए का मुनाफा दर्ज किया, लेकिन मध्य प्रदेश उन राज्यों में शामिल है जहां पुरानी गलत नीतियों, लाइन लॉस और वसूली की कमजोरी ने हालात नहीं सुधरने दिए।
छह राज्य, दो-तिहाई कर्ज
उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और तमिलनाडु—ये छह राज्य मिलकर देश के कुल डिस्कॉम कर्ज का 66 प्रतिशत हिस्सा संभाले हुए हैं। इनकी कुल देनदारी 2.74 ट्रिलियन रुपए बताई गई है।
तीनों कंपनियां घाटे की गिरफ्त में
मध्य प्रदेश की पूर्व, पश्चिम और मध्य क्षेत्र की बिजली वितरण कंपनियां लगातार घाटे में चल रही हैं। कर्ज का दबाव इतना बढ़ चुका है कि नई योजनाओं और ढांचागत सुधारों की रफ्तार भी प्रभावित हो रही है।
सुधार की कोशिशें, लेकिन असर सीमित
केंद्र सरकार की संशोधित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS) के तहत राज्यों को प्रदर्शन आधारित फंडिंग दी जा रही है। इसके साथ ही बिजली सुधारों की शर्त पर राज्यों को GSDP के 0.5% तक अतिरिक्त कर्ज लेने की छूट भी मिली है। सरकार का कहना है कि तकनीकी और वाणिज्यिक नुकसान घटे हैं, लेकिन मध्य प्रदेश में बिजली कंपनियों को पटरी पर लाने के लिए अभी ठोस और तेज फैसलों की जरूरत है।
समझिए क्यों नहीं खत्म होता घाटा?
हर साल का नुकसान जुड़ता जाता है और वही संचयी घाटा बनता है। ऐसे में एक साल का मुनाफा भी सालों की भरपाई नहीं कर पाता—यही वजह है कि मप्र की बिजली कंपनियां आज भी दबाव में हैं।