ग्वालियर। 
मध्य प्रदेश के डीजीपी कैलाश मकवाना के हलफनामे पर ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने गुरुवार को ग्वालियर की एसएएफ बटालियन 14 के आरक्षक रजनेश सिंह भदौरिया की विभागीय जांच से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि राज्य शासन एक ओर तो दावा करता है कि जांच नियमों के अनुसार की गई, वहीं दूसरी ओर उन्हीं अधिकारियों को बचाने में लगा है, जिन्होंने अदालत के सामने अधूरा और गलत तथ्य प्रस्तुत किया।
कोर्ट ने असिस्टेंट कमांडेंट शैलेन्द्र भारती की भूमिका पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्होंने जो शपथ पत्र और जवाब पेश किया, उसमें कई महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए। अदालत ने कहा-
उनका जवाब टालमटोल वाला और जानबूझकर भ्रामक था। ओआईसी (ऑफिसर इन चार्ज) किसी कर्मचारी की मदद करने के लिए नहीं, बल्कि राज्य शासन की ओर से सही तथ्य रखने के लिए नियुक्त किए जाते हैं।
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब शासन का दावा है कि उसने कोई गलती नहीं की, तो फिर उसने पुनर्विचार याचिका क्यों दायर की। हाईकोर्ट ने डीजीपी से इस मामले पर जवाब तलब किया है और अगली सुनवाई की 7 नवंबर 2025 निर्धारित की है।
इस मामले में शासन ने यह तर्क दिया
कोर्ट में पुनर्विचार याचिका में बहस पर शासन की ओर से तर्क दिया गया है कि रजनेश की जांच में एक प्रेजेंटिंग ऑफिसर नियुक्त किया गया था और प्रेजेंटिंग ऑफिसर ने जिरह की थी। न्यायालय ने पाया कि मूल रिट याचिका के जवाब में राज्य की ओर से दायर हलफनामा (शैलेंद्र भारती द्वारा) में इस महत्वपूर्ण तथ्य को स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया और याचिकाकर्ता के आरोपों का एक अस्पष्ट जवाब दिया गया। इसको लेकर कोर्ट ने डीजीपी से शपथ पत्र मांगा था। डीजीपी ने शपथ पत्र में जिम्मेदार अधिकारी का बचाव किया।
क्या कहता है DGP का शपथ पत्र
DGP ने अपने शपथ पत्र में कहा है कि तत्कालीन ओआईसी शैलेंद्र भारती की कोई दुर्भावना नहीं थी, इसलिए उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई आवश्यक नहीं है और विभागीय स्तर पर उन्हें दोषमुक्त माना जाता है। इस जवाब पर ही हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए उपरोक्त टिप्पणी की। कोर्ट ने अतिरिक्त महाधिवक्ता को स्पष्ट रूप से निर्देश दिए कि डीजीपी के आदेश को न्यायालय के सामने तर्कसंगत तरीके से नियोचित ठहराएं यदि आवश्यकता हो तो डीजीपी स्वयं पूरक हलफनामा जमा करें ।
ऐसे समझिए पूरा मामला
मामला ग्वालियर की एसएएफ बटालियन 14 आरक्षक रजनेश सिंह भदौरिया की विभागीय जांच से जुड़ा है। भदौरिया का आरोप था कि जांच अधिकारी ने प्रस्तुतिकरण अधिकारी नियुक्त न कर स्वयं ही अभियोजक की भूमिका निभाई। यह कार्यवाही नियमों और पूर्व न्यायिक निर्णयों के विपरीत थी। इसी आधार हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने 28 अगस्त 2024 को रजनेश के पक्ष में फैसला दिया। इस फैसले के खिलाफ राज्य शासन ने रिव्यू पिटीशन दायर की।