भोपाल। 
राजधानी की सड़कों को लेकर इन दिनों पीडब्ल्यूडी विभाग सवालों के घेरे में है. मामला उन 122 किलोमीटर लंबी सड़कों से जुड़ा है जिनका बीते साल तक गारंटी पीरियड खत्म हो गया. ठेकेदारों से समय रहते मरम्मत नहीं कराई गई और अब हालत यह है कि करीब 60 फीसदी सड़कें गारंटी से बाहर हो चुकी हैं. विभाग अब जांच कर रहा है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है. शहर के नेहरू नगर, भदभदा, कलियासोत, वैशाली नगर, पीएंडटी और सूरज नगर समेत कई इलाकों की सड़कें इस दायरे में आ रही हैं. गारंटी खत्म होने का सीधा मतलब है कि ठेकेदार पर अब मरम्मत का दबाव नहीं बनाया जा सकता. ऐसे में पूरा खर्च विभाग को खुद उठाना होगा. शुरुआती आकलन में करीब 32 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है. सवाल यह उठ रहा है कि जब ठेकेदारों पर गारंटी के दौरान मरम्मत कराने की जिम्मेदारी थी, तब लापरवाही क्यों हुई? अब शासन ने इस मामले पर रिपोर्ट मांगी है और अफसरों की भूमिका की पड़ताल की जा रही है. पिछले दो महीनों में पीडब्ल्यूडी के ज्यादातर इंजीनियर ट्रांसफर हो चुके हैं, जिससे जिम्मेदारी तय करने में और दिक्कतें सामने आ रही हैं.
विभाग पर आया बोझ
इस समय पीडब्ल्यूडी के रिकॉर्ड में गारंटी वाली सड़कें सिर्फ 256 किलोमीटर बची हैं. जबकि पिछले साल तक 378 किलोमीटर सड़कें गारंटी में थीं. पूरे शहर की 516 किलोमीटर लंबाई वाली सड़कों में से केवल 138 किलोमीटर ऐसी थीं जिनकी देखरेख सीधे विभाग के जिम्मे थी. अब यह आंकड़ा लगभग दोगुना हो गया है, जिससे विभाग पर आर्थिक बोझ भी बढ़ गया है.
कौन करता है मरम्मत?
गौरतलब है कि गारंटी में आने वाली सड़कों की मरम्मत ठेकेदारों द्वारा की जाती है और यह पूरी तरह प्रक्रिया का हिस्सा है. लेकिन समय रहते जिम्मेदारी तय न करने के कारण विभागीय स्तर पर अब सरकार को जवाब देना पड़ रहा है. इस पूरे मामले पर विभाग के सीई संजय मस्के का कहना है कि गारंटी में आने वाली सड़कें पूरी तरह ठेकेदारों के जिम्मे हैं, जबकि गारंटी से बाहर हो चुकी सड़कों को सुधारने की योजना विभाग को बनानी पड़ती है.