चंबल में दो SP की विदाई: भिंड में 'कंधों' पर विदा हुए असित यादव, मुरैना में समीर सौरभ के जाने पर बंटी 'मिठाई'!
भिंड-मुरैना।
चंबल संभाग के दो पड़ोसी जिलों में हाल ही में पुलिस कप्तानों के तबादले हुए, लेकिन विदाई के जो दो मंजर सामने आए हैं, वे प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गए हैं। एक तरफ जहाँ भिंड के एसपी असित यादव के जाने पर पूरा शहर भावुक नजर आया, वहीं दूसरी ओर मुरैना के एसपी समीर सौरभ के ट्रांसफर पर पुलिस महकमे से लेकर आम जनता तक 'राहत की सांस' ले रही है।
भिंड: एसपी नहीं, 'भाई' को दी विदाई
2011 बैच के आईपीएस असित यादव का भिंड से प्रमोशन के साथ तबादला हुआ। उनकी विदाई किसी उत्सव से कम नहीं थी। भिंड की जनता और पुलिस विभाग ने उन्हें पलकों पर बिठाया। विदाई समारोह में पुलिसकर्मियों ने उन्हें कंधों पर उठाकर नाचते-गाते विदा किया। यह नजारा बता रहा था कि असित यादव ने भिंड में केवल ड्यूटी नहीं की, बल्कि लोगों का दिल भी जीता। हर किसी की आंख में आंसू थे कि एक 'शानदार' अधिकारी जिला छोड़कर जा रहा है।
मुरैना: सन्नाटा और मिठाई का शोर
अब बात करते हैं भिंड के पड़ोसी जिले मुरैना की। यहाँ के एसपी रहे समीर सौरभ का तबादला हुआ तो नजारा बिल्कुल उलट था। यहाँ न तो कोई विदाई समारोह हुआ, न ही कोई उन्हें रोकने वाला मिला। चर्चा तो यहाँ तक है कि उनके ट्रांसफर की खबर सुनते ही विभाग के कुछ लोगों ने खुशियां मनाईं।
क्यों रही विदाई में जमीन-आसमान की दूरी?
जानकारों का कहना है कि दोनों अधिकारियों की कार्यशैली में बड़ा अंतर था: असित यादव जहाँ अपनी टीम को साथ लेकर चलते थे, वहीं समीर सौरभ की छवि एक 'अव्यवहारिक' अधिकारी की बन गई थी। आरोप है कि समीर सौरभ को अपने ही मातहतों (कांस्टेबल से लेकर टीआई तक) को दंड देने और प्रताड़ित करने में 'आनंद' आता था। इसी व्यवहार के कारण विभाग के भीतर उनके प्रति भारी आक्रोश था। आलम यह रहा कि मुरैना में किसी ने उन्हें एक 'फॉर्मल' फेयरवेल देने तक की जहमत नहीं उठाई। वे गुपचुप तरीके से अपना सामान समेटकर विदा हो गए।
नए अधिकारियों के लिए बड़ा सबक
यह घटनाक्रम नए आईपीएस अधिकारियों के लिए एक बड़ा सबक है। वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र जैन कहते हैं कि वर्दी की धौंस और दंड देने की प्रवृत्ति आपको कुर्सी तो दिला सकती है, लेकिन सम्मान नहीं। भिंड और मुरैना की इन दो तस्वीरों ने साफ कर दिया है कि इतिहास में किसका नाम 'सम्मान' के साथ दर्ज होगा और किसे लोग 'पिंड छूटने' की राहत के रूप में याद रखेंगे। क्या अधिकारी केवल फाइलों और दंड के दम पर शासन चलाना चाहते हैं, या असित यादव की तरह जनता और विभाग के दिलों में जगह बनाना उनकी प्राथमिकता है?

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