आलीराजपुर। 
"दांत तोड़ दूंगा... यहीं जमीन में गाड़ दूंगा।" सत्ता के गलियारों से निकली यह एक धमकी आज आलीराजपुर जनपद पंचायत कार्यालय की पहचान बन चुकी है। कैबिनेट मंत्री नागर सिंह चौहान के भाई इंदर सिंह चौहान की इस कथित दबंगई ने एक महिला अधिकारी को छुट्टी पर जाने पर मजबूर कर दिया है, वहीं बाकी कर्मचारी खौफ के साये में काम कर रहे हैं।
दफ्तर नहीं, 'खामोश टापू' बना जनपद कार्यालय
"दफ्तर के भीतर पसरे इस डर को करीब से महसूस करने जब पड़ताल की गई, तो वहाँ का नजारा चौंकाने वाला था। सुबह के 11 बजे, जब सरकारी दफ्तरों में फाइलों और फरियादियों की भीड़ होनी चाहिए, वहाँ गहरा सन्नाटा पसरा था। दफ्तर के भीतर 20-25 कर्मचारियों का स्टाफ बैठता है, लेकिन आज ज्यादातर टेबल सूनी पड़ी हैं। जो कर्मचारी ड्यूटी पर मौजूद हैं, वे कैमरे या डायरी देखते ही कतरा रहे हैं। किसी भी कर्मचारी से जब 22 अप्रैल की घटना के बारे में पूछा जाता है, तो वे नजरें चुराकर वहाँ से हट जाते हैं। एक कर्मचारी ने दबी जुबान में सिर्फ इतना कहा, "साहब, यहाँ दीवारों के भी कान हैं, हमें काम करने दीजिए।"
विवाद की जड़: सरकारी खजाने पर 'फर्जी' सेंध लगाने की कोशिश
यह पूरा मामला मुख्यमंत्री कन्यादान योजना में हो रहे एक बड़े फर्जीवाड़े को रोकने से जुड़ा है। नियम कहते हैं कि योजना का लाभ केवल उन्हीं को मिलेगा जो पहली बार परिणय सूत्र में बंध रहे हैं। शासन एक शादी पर ₹55,000 खर्च करता है, जिसमें से ₹49,000 सीधे दुल्हन के खाते में जाते हैं। विवाद तब शुरू हुआ जब 6 मई को होने वाले सामूहिक विवाह सम्मेलन के लिए कुछ ऐसे आवेदन आए, जिनके साथ शादी के कार्ड पहले से लगे थे। यानी वे जोड़े पहले ही शादीशुदा थे। जनपद सीईओ प्रिया काग ने जब नियमों का हवाला देते हुए इन अपात्र आवेदनों को निरस्त किया, तो 'रसूखदार' भाई का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। आरोप है कि वे अपने करीबियों को अपात्र होने के बावजूद सरकारी पैसा दिलाना चाहते थे।
न्याय की उम्मीद और वर्तमान स्थिति
फिलहाल, आरोपी इंदर सिंह चौहान जमानत पर बाहर घूम रहा है। दूसरी ओर, अपनी ईमानदारी की कीमत चुका रहीं सीईओ प्रिया काग अवकाश पर चली गई हैं। एक कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी का इस तरह सुरक्षा के अभाव में दफ्तर छोड़ना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।