उज्जैन/नागदा। 
मध्य प्रदेश में कानून-व्यवस्था के दोहरे मापदंडों को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला कर्नाटक के राज्यपाल और भाजपा के दिग्गज नेता थावरचंद गहलोत के पोते मनीष गहलोत से जुड़ा है, जिन पर सरकारी अस्पताल में उपद्रव करने और डॉक्टर को धमकी देने के गंभीर आरोप लगे हैं।
क्या है पूरा मामला?
घटना 25 मार्च की बताई जा रही है, जब मनीष गहलोत अपने कुछ साथियों के साथ नागदा के सिविल अस्पताल पहुंचे। आरोप है कि दोपहर 3 से 4 बजे के बीच उन्होंने वहां जमकर हंगामा किया। सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों से नाराज होकर मनीष ने अस्पताल का डाटा देखने की कोशिश की। अस्पताल का कंप्यूटर और सीपीयू उठाकर अपने साथ ले गए। ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों के साथ गाली-गलौज और मारपीट की गई। ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (BMO) डॉ. शिवराज कौशल ने लिखित शिकायत में आरोप लगाया है कि मनीष गहलोत ने उन्हें उनकी पत्नी को उठा ले जाने की धमकी दी।
पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल
हैरानी की बात यह है कि घटना के सीसीटीवी फुटेज मौजूद होने के बावजूद, नागदा की बिरला ग्राम पुलिस पिछले 8 दिनों से यह कहकर बचती रही कि उनके पास कोई लिखित शिकायत नहीं है। अब, जब बीएमओ ने बाकायदा लिखित आवेदन दे दिया है, तब भी पुलिस 'जांच' का हवाला देकर गिरफ्तारी से बचती नजर आ रही है।
दबाव की राजनीति और 'पलटी' मारते बयान
ताजा अपडेट के अनुसार, इस मामले में अब राजनीतिक दबाव का खेल शुरू हो गया है। बीएमओ डॉ. शिवराज कौशल के सुर बदलते नजर आ रहे हैं। उन्होंने मीडिया में बयान दिया है कि उन्होंने "वरिष्ठ अधिकारियों के कहने पर" वह चिट्ठी लिखी थी। वहीं, आरोपी मनीष गहलोत ने बीएमओ को ही 'भ्रष्ट' बताते हुए कहा कि वे केवल कंप्यूटर ठीक कराने के लिए ले गए थे। खास बात तो यह भी है कि मध्य प्रदेश के डीजीपी स्वयं उज्जैन जिले से ताल्लुक रखते हैं, ऐसे में उनके गृह जिले में एक सरकारी डॉक्टर को धमकी मिलना और पुलिस का सुस्त रवैया राज्य की न्याय व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करता है। अब देखना यह है कि क्या मोहन यादव सरकार इस 'बिगड़े हुए पोते' पर कोई ठोस कार्रवाई कर पाती है या मामला रसूख के नीचे दबा दिया जाएगा।