"नागदा में 'महामहिम' के पोते का तांडव: क्या राज्यपाल का परिवार होने से बदल जाता है कानून? सरकारी डेटा चोरी पर पुलिस मौन!"
उज्जैन/नागदा।
रसूख जब कानून पर हावी होता है, तो तस्वीरें नागदा के सिविल अस्पताल जैसी निकलकर आती हैं। कर्नाटक के राज्यपाल और भाजपा के दिग्गज नेता थावरचंद गहलोत के पोते मनीष गहलोत पर नागदा के सरकारी अस्पताल से जबरन सरकारी दस्तावेज और डेटा से भरा CPU चोरी छिपे (या दबंगई से) उठाकर ले जाने का गंभीर आरोप लगा है। इस पूरी घटना का CCTV फुटेज अब सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है।
क्या है पूरा मामला?
मिली जानकारी के अनुसार, मनीष गहलोत नागदा में एक निजी अस्पताल संचालित करते हैं। बताया जा रहा है कि उनके अस्पताल से जुड़ी किसी शिकायत या CM हेल्पलाइन की जांच को लेकर उनका बीएमओ (BMO) कार्यालय से विवाद चल रहा था। इसी विवाद के बीच मनीष गहलोत अपने एक साथी के साथ अस्पताल के रूम नंबर 23 में घुसे और वहां रखा सरकारी CPU उठाकर चलते बने।
प्रशासन की 'नपुंसकता' या दबाव?
हैरानी की बात यह है कि घटना के कई दिन बीत जाने और सीसीटीवी फुटेज सामने आने के बावजूद अब तक पुलिस ने कोई एफआईआर दर्ज नहीं की है।बीएमओ खुद को छुट्टी पर बताकर पल्ला झाड़ रहे हैं।
सीएमएचओ कह रहे हैं कि "माल वापस आ गया है," जैसे सरकारी डेटा की चोरी कोई मामूली बात हो। पुलिस का कहना है कि उन्हें अब तक कोई लिखित शिकायत ही नहीं मिली है।
विवादों से पुराना नाता
यह पहली बार नहीं है जब गहलोत परिवार विवादों में है। इससे पहले भी थावरचंद गहलोत की एक पोत्र-वधू (दिव्या) ने परिवार पर दहेज प्रताड़ना, नशाखोरी और मारपीट के गंभीर आरोप लगाए थे, जिसका मामला इंदौर के बॉम्बे हॉस्पिटल तक पहुंचा था।
सियासी गलियारों में चर्चा: 'दो कानून' का राज?
वरिष्ठ पत्रकारों और विश्लेषकों का कहना है कि मध्य प्रदेश में अब दो तरह के कानून चल रहे हैं—एक आम जनता के लिए और दूसरा सत्ता के करीबियों के लिए। सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और डेटा चोरी करना सिर्फ इसलिए अपराध नहीं है क्योंकि आरोपी एक राज्यपाल का पोता है? क्या थावरचंद गहलोत खुद पहल कर अपने पोते के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेंगे? क्या वे अपनी बेदाग छवि को बचाने के लिए कानून को अपना काम करने देंगे, या सत्ता की हनक के नीचे इस मामले को भी दबा दिया जाएगा?

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