छतरपुर/पन्ना। 
बुंदेलखंड, जो दशकों से सूखे और पानी की किल्लत की मार झेल रहा है, आज एक बार फिर चर्चा में है। लेकिन इस बार वजह पानी की कमी नहीं, बल्कि पानी पहुँचाने के लिए शुरू हुई केन-बेतवा लिंक परियोजना है। जहाँ सरकार इसे इलाके के लिए 'गेम चेंजर' बता रही है, वहीं स्थानीय ग्रामीणों ने अपनी जमीन और अस्तित्व बचाने के लिए 'चिता आंदोलन' शुरू कर दिया है।
क्या है पूरा मामला?
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के 'नदी जोड़ो' सपने को साकार करने वाली यह देश की पहली बड़ी परियोजना है। 44,000 करोड़ रुपये की इस योजना के तहत मध्य प्रदेश की केन नदी के अतिरिक्त पानी को उत्तर प्रदेश की बेतवा नदी तक पहुँचाया जाना है। इसके लिए छतरपुर और पन्ना की सीमा पर 77 मीटर ऊँचा दौड़न बांध बनाया जा रहा है।
विकास के बड़े दावे
सरकार के अनुसार, इस महात्वाकांक्षी परियोजना से बुंदेलखंड की तस्वीर बदल जाएगी। सिंचाई: लगभग 10 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई की सुविधा मिलेगी।पेयजल: 62 लाख लोगों को पीने का शुद्ध पानी उपलब्ध होगा। परियोजना से कई मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा । 2024 में शिलान्यास के बाद इसे 2030 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
विस्थापन और पर्यावरण का कड़वा सच
सुखद भविष्य के इन दावों के बीच 7,000 से अधिक परिवारों की नींद उड़ी हुई है। आंदोलनकारियों का कहना है कि हजारों आदिवासी और किसान बेघर हो जाएंगे। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें न तो उचित मुआवजा मिला है और न ही संतोषजनक पुनर्वास की व्यवस्था की गई है। बांध के कारण लगभग 9,000 हेक्टेयर क्षेत्र जलमग्न होगा, जिसमें पन्ना टाइगर रिजर्व का एक बड़ा हिस्सा शामिल है। इससे बाघों, गिद्धों और दुर्लभ वन्यजीवों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।
जल विशेषज्ञों ने सरकार के 'सरप्लस पानी' (अतिरिक्त जल) के दावे पर भी सवाल उठाए हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि दोनों नदियों का भौगोलिक क्षेत्र समान है, तो एक में पानी ज्यादा और दूसरी में कम कैसे हो सकता है?
'चिता पर लेटकर' अनोखा विरोध
अप्रैल 2026 में यह विरोध अपने चरम पर पहुँच गया है। हजारों की संख्या में किसान और आदिवासी सड़कों पर हैं। प्रदर्शनकारियों ने सांकेतिक रूप से चिताएं सजाईं और उन पर लेटकर सरकार को यह संदेश दिया कि वे अपनी जमीन के लिए जान देने को तैयार हैं। प्रशासन ने स्थिति संभालने के लिए कई प्रतिबंधात्मक आदेश लागू किए हैं, लेकिन आंदोलन की गूँज कम होती नहीं दिख रही।
संतुलन की चुनौती
क्या बुंदेलखंड की प्यास बुझाने की कीमत उन लोगों को चुकानी होगी जो सदियों से इस मिट्टी और जंगल से जुड़े हैं? विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि बड़े बांधों के बजाय स्थानीय तालाबों के पुनर्जीवन और 'माइक्रो इरीगेशन' (सूक्ष्म सिंचाई) जैसे विकल्प अधिक टिकाऊ हो सकते हैं। फिलहाल, केन-बेतवा लिंक परियोजना सिर्फ दो नदियों को जोड़ने का काम नहीं कर रही, बल्कि यह विकास और संवेदनशीलता के बीच के बड़े अंतर को भी उजागर कर रही है।