मुरैना। 
जब एक रक्षक, भक्षक के हाथों कुचल दिया जाए और व्यवस्था तमाशबीन बनी रहे, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र के फेफड़ों में रेत भर गई है। आज बात होगी हरिकेश गुर्जर की, बात होगी उन 11 शहीदों की जिन्हें पिछले 10 साल में रेत माफिया ने ट्रैक्टरों से रौंद दिया, और बात होगी उस 'सियासी वरदहस्त' की जो हत्यारों को 'पेट माफिया' बताकर ढाल बन जाता है।
मुरैना और अंबाह के बीच रानपुर तिराहे पर सुबह 5:30 बजे सन्नाटा था, लेकिन वन संरक्षक हरिकेश गुर्जर अपनी ड्यूटी पर तैनात थे। हाथ में सिर्फ एक डंडा था और सामने से मौत बनकर आ रही थी अवैध रेत से भरी एक बिना नंबर की ट्रैक्टर-ट्रॉली। हरिकेश ने उसे रोकने की हिम्मत जुटाई, लेकिन माफिया के गुर्गे के सिर पर खून सवार था। उसने हरिकेश के सिर पर पहिया चढ़ा दिया। सीसीटीवी न होता तो शायद यह मामला भी 'हिट एंड रन' की फाइलों में दब जाता। ड्राइवर ने वारदात के बाद पेट्रोल पंप पर रेत खाली की, कपड़े बदले और ऐसे निकला जैसे कुछ हुआ ही न हो।
'खादी' का ढाल: पेट माफिया या वोट माफिया?
सबसे शर्मनाक पहलू राजनीति का है। मार्च 2025 में प्रदेश के कृषि मंत्री ऐदल सिंह कंसाना का बयान याद कीजिए— "इन्हें रेत माफिया मत कहिए, ये पेट माफिया हैं।" * सवाल: मंत्री जी, क्या किसी का पेट भरने के लिए एक सरकारी कर्मचारी की हत्या जायज है? इस घटना में जिस ट्रैक्टर-ट्रॉली का नाम आ रहा है, वह कथित तौर पर बीजेपी के दो पदाधिकारियों (पवन तोमर और सोनू चौहान) की बताई जा रही है। यही कारण है कि प्रशासन के हाथ-पांव फूल रहे हैं।
इस मामले में वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल जी के विश्लेषण से साफ है कि यह सिर्फ कानून-व्यवस्था की नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक और आर्थिक समस्या है। इस बेल्ट में युवाओं के पास न तो खेती बची है, न ही उद्योग। औद्योगिक इकाइयों के नाम पर सन्नाटा है।
बागी से अपराधी तक
कभी चंबल के बीहड़ों में 'बागी' हुआ करते थे, अब उनकी जगह 'रेत माफिया' ने ले ली है। जब आईपीएस अधिकारी नरेंद्र सिंह को कुचला गया था, तब लगा था कि व्यवस्था जागेगी। लेकिन आज भी एसपी ऑफिस के सामने से बिना नंबर के ट्रैक्टर सीना तानकर निकलते हैं और खास बात तो यह भी है कि यह केवल इंसानों की हत्या नहीं है, यह चंबल और उसकी सहायक नदियों की भी हत्या है।  पोकलेन मशीनें और अवैध पुल बनाकर नदियों का सीना छलनी किया जा रहा है। अवैध खनन का कारोबार सालाना करोड़ों का है, लेकिन सरकार के खाते में सिर्फ चंद जुर्माना राशि पहुँचती है।
'सबकी खबर' के तीखे सवाल:

  • क्या मुख्यमंत्री मोहन यादव उन बीजेपी पदाधिकारियों पर 'बुलडोजर' चलवाएंगे जिनका नाम इस हत्याकांड में आ रहा है?
  • क्या पुलिस केवल डंडा लेकर माफिया के सामने खड़े होने वाले कर्मचारियों को शहीद होने के लिए छोड़ देगी? उनकी सुरक्षा के लिए बंदूकें क्यों वापस जमा करा ली गईं?
  • क्या सरकार के पास चंबल के युवाओं के लिए 'रेत की ट्रॉली' के अलावा कोई 'रोजगार की फैक्ट्री' है?

अगर आज हम नहीं जागे, तो कल मुरैना की गलियों में कानून नहीं, सिर्फ माफिया की ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की गड़गड़ाहट सुनाई देगी। हरिकेश गुर्जर के 2 साल के बेटे ने जब उन्हें मुखाग्नि दी, तो वह आग सिर्फ चिता में नहीं, बल्कि इस भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ जनता के दिलों में भी लगनी चाहिए।