इंदौर। 
नगर निगम के बजट सत्र में उठे वंदे मातरम् विवाद ने अब सियासी रंग गहरा कर दिया है। मामले को कांग्रेस आलाकमान ने गंभीरता से लेते हुए प्रदेश के कई बड़े नेताओं से जवाब-तलब की तैयारी कर ली है। सूत्रों के मुताबिक, जल्द ही संबंधित नेताओं को दिल्ली बुलाकर स्पष्टीकरण लिया जा सकता है। बताया जा रहा है कि संगठन के शीर्ष नेतृत्व की नाराजगी के बाद प्रदेश प्रभारी ने सख्त रुख अपनाया है। इंदौर से जुड़े इस विवाद पर कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और प्रभारी हरीश चौधरी से पूरी रिपोर्ट मांगी है। वहीं, पार्टी की अनुशासन समिति भी सक्रिय हो गई है और भोपाल में पेशी की तैयारी चल रही है। इस पूरे विवाद के केंद्र में पार्षद रूबीना खान, फौजिया अलीम, चिंटू चौकसे और केके मिश्रा के बयान हैं। चारों नेताओं को पार्टी लाइन से हटकर टिप्पणी करने के आरोप में जवाब देना पड़ सकता है। इधर, विवाद बढ़ने के बाद पार्षद रूबीना खान ने अपने बयान पर खेद जताया है। उन्होंने कहा कि बजट सत्र के दौरान माहौल पहले से ही तनावपूर्ण था और विरोधी पक्ष की नारेबाजी ने स्थिति को और भड़का दिया। रूबीना ने स्वीकार किया कि गुस्से में उनके मुंह से ऐसे शब्द निकल गए, जो नहीं निकलने चाहिए थे और इसका उन्हें जीवनभर अफसोस रहेगा। रूबीना ने सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने कभी भी राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत का अनादर नहीं किया है। पिछली बैठकों के वीडियो इसका प्रमाण हैं, जहां वे पूरे सम्मान के साथ खड़ी नजर आती हैं। उन्होंने इस पूरे विवाद को लेकर कहा— “बारात कहीं और जा रही थी, लेकिन उतर मेरे घर गई।” वहीं, अन्य नेताओं के बयान भी पार्टी के लिए मुश्किल का कारण बने हैं। चिंटू चौकसे ने जहां राष्ट्रगीत को अनिवार्य करने की बात कही, वहीं केके मिश्रा ने राष्ट्रगीत न गाने वालों को पाकिस्तान जाने की सलाह दे दी। फौजिया अलीम के बयान को भी पार्टी ने अनुचित माना है। ऐसे में सभी नेताओं से कड़ा जवाब मांगा जा सकता है। उधर, इस मुद्दे पर भाजपा भी हमलावर है। विधायक मालिनी गौड़ ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जो वंदे मातरम् नहीं बोलता, उनसे वोट मांगने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने साफ कहा कि इस देश में रहने वालों को राष्ट्रगीत और भारत माता की जय बोलना ही होगा। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यदि नेताओं के जवाब संतोषजनक नहीं पाए गए, तो पार्टी अनुशासनात्मक कार्रवाई से भी पीछे नहीं हटेगी। फिलहाल, सभी की नजर दिल्ली दरबार के फैसले पर टिकी है, जो आने वाले दिनों में प्रदेश कांग्रेस की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।