ग्वालियर।
 मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने सड़कों पर धड़ल्ले से दौड़ रहे और ट्रैफिक व्यवस्था बिगाड़ रहे ई-रिक्शों के संचालन पर गहरी चिंता जताई है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि बिना उचित परमिट, लाइसेंस और तय रूट के सड़कों पर घूम रहे ई-रिक्शा अब एक 'राष्ट्रीय समस्या' बन चुके हैं। ग्वालियर बेंच में एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवैंद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने केंद्र सरकार को इस संबंध में एक प्रभावी और व्यापक नीति तैयार करने का सख्त निर्देश दिया है।
याचिका और अदालती सुनवाई के मुख्य बिंदु
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि प्रभावी विधिक ढांचे के बिना ई-रिक्शों की बेतहाशा बढ़ती संख्या न केवल भीषण ट्रैफिक जाम का कारण बन रही है, बल्कि उन वाहन चालकों के साथ भी अन्याय है जो कानूनी रूप से परमिट लेते हैं, टैक्स चुकाते हैं और सभी जरूरी शुल्क भरकर अपने वाहन संचालित करते हैं। इस असमान स्थिति के चलते सड़कों पर अराजकता का माहौल पैदा हो रहा है, जिसे समय रहते नियंत्रित करना बेहद जरूरी हो गया है।
एमपी हाईकोर्ट ने अनियंत्रित ई-रिक्शों के संचालन को 'राष्ट्रीय समस्या' माना।

  • केंद्र सरकार को 60 दिनों के भीतर पूरे देश के लिए नीति बनाने का निर्देश।
  • ई-रिक्शों की संख्या सीमित करने और रूट परमिट जारी करने पर होगा जोर।
  • मध्य प्रदेश सरकार को केंद्र की नीति आने के बाद 60 दिन का समय समीक्षा के लिए मिला।

केंद्र और राज्य सरकारों के लिए समय-सीमा तय
अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह आगामी 60 दिनों के भीतर एक ऐसी राष्ट्रीय नीति का प्रारूप तैयार करे जो देश के सभी शहरों में ई-रिक्शों की संख्या और उनके मूवमेंट को सुव्यवस्थित कर सके। इस नीति के तहत रूट परमिट जारी करने के कड़े नियम बनाए जाएंगे। केंद्र द्वारा नीति तैयार किए जाने के बाद इसे सभी राज्यों को भेजा जाएगा, जिसके बाद मध्य प्रदेश सरकार को भी इस नीति का अध्ययन कर इसे लागू करने के लिए 60 दिन का अतिरिक्त समय दिया गया है।