ग्वालियर। 
देश के हर शहर और कस्बे के चौराहों पर महापुरुषों की प्रतिमाएं तो लगा दी जाती हैं, लेकिन क्या उनकी देखरेख हो रही है? ग्वालियर के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री भगवान सिंह यादव ने एक ऐसा सवाल खड़ा किया है जिसने शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। उनका कहना है कि गांधी, नेहरू, अंबेडकर, सावरकर और सिंधिया राजपरिवार की मूर्तियों पर महीनों तक धूल जमी रहती है, पक्षी बीट करते हैं और कोई सुध लेने वाला नहीं है।
चिट्ठियां बहुत लिखीं, पर 'जमीर' सिर्फ एक का जागा
भगवान सिंह यादव ने देश के कई मुख्यमंत्रियों (यूपी, राजस्थान, छत्तीसगढ़, एमपी) को पत्र लिखे। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस पर तुरंत एक्शन लिया और पूरे राज्य में मूर्तियों के संधारण और सम्मान के आदेश जारी किए। मध्य प्रदेश में स्थिति इसके उलट है। यादव जी ने मुख्यमंत्री मोहन यादव, नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल को भी पत्र लिखे, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
प्रभारी मंत्रियों की 'अक्ल' पर रहम आता है !
इंटरव्यू के दौरान यादव जी का दर्द और गुस्सा साफ दिखा। उन्होंने कहा कि जो मंत्री खुद को जिले का भाग्यविधाता समझते हैं, उन्हें उन मूर्तियों की तौहीन नहीं दिखती जिन्होंने इस देश को बनाया है। ग्वालियर में सिंधिया परिवार की कई मूर्तियां हैं, लेकिन उनके 'खास' मंत्रियों को भी उनकी सफाई कराने की फुरसत नहीं है। "मूर्तियां प्रेरणा के लिए होती हैं, तौहीन के लिए नहीं। यदि शासन इनका रखरखाव नहीं कर सकता, तो अगली मूर्ति लगाने पर तब तक रोक लगनी चाहिए जब तक नगर निगम लिखित में जिम्मेदारी न ले।" यह शर्मनाक है कि जिस देश में करोड़ों रुपये विज्ञापनों और लाडली बहना जैसी योजनाओं पर खर्च होते हैं, वहां महापुरुषों की प्रतिमाओं पर एक माला और पानी की बौछार के लिए बजट का रोना रोया जाता है। अगर हम अपने इतिहास का सम्मान नहीं कर सकते, तो हमें उसे चौराहों पर सजाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। क्या प्रशासन सिर्फ पत्थर खड़ा करना जानता है, या उनमें बसने वाले सम्मान की रक्षा भी करेगा?