धार। 
 ऐतिहासिक और विवादित भोजशाला-कमल मौला मस्जिद मामले में इंदौर हाईकोर्ट में शुक्रवार को अहम दलीलें पेश की गईं। याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी की ओर से पेश हुए अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने प्राचीन ग्रंथों और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के रिकॉर्ड के आधार पर दावा किया कि यह स्थल मूल रूप से 'सरस्वती कंठाभरण' नामक शिक्षा का केंद्र था। उन्होंने अदालत के सामने परमार कालीन वास्तुकला के वे साक्ष्य रखे, जो इस स्थान के मंदिर होने की पुष्टि करते हैं।
राजा भोज के ' समरांगण सूत्रधार ' का हवाला
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच के सामने दलील देते हुए वकील मनीष गुप्ता ने राजा भोज द्वारा रचित ग्रंथ 'समरांगण सूत्रधार' का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राजा भोज ने वास्तुकला, मानव विज्ञान और भूगोल जैसे विषयों पर 89 अध्यायों वाला विशाल ग्रंथ लिखा था। इतनी गहन विद्या और शोध केवल एक समर्पित शिक्षण केंद्र में ही संभव थे, जिसे भोजशाला के रूप में जाना गया।
वाग्देवी की प्रतिमा और विशेष 'सर्पबंधी' शैली
कोर्ट में वाग्देवी यानी माता सरस्वती की प्रतिमा और मंदिर की बनावट पर विस्तृत जानकारी दी गई। याचिकाकर्ता के अनुसार भोजशाला में 'सर्पबंधी' शैली के शिलालेख मिले हैं, जो दुनिया में केवल दो अन्य जगहों, एक तो उज्जैन के जूना महाकाल और दूसरा ऊन के चौबारा मंदिर पर मिलते हैं। ये दोनों स्थान भी प्राचीन काल में शिक्षा के केंद्र थे। एक और तर्क यह दिया गया कि चूंकि पत्थरों की कार्बन डेटिंग संभव नहीं है, इसलिए वाग्देवी की प्रतिमा पर उकेरे गए आभूषणों और शिल्प की तुलना अन्य परमारकालीन मूर्तियों से की गई है, जो इनके एक ही कालखंड के होने की पुष्टि करते हैं।
क्यों खास है यह दलील?
यह दलील इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल धार्मिक आस्था पर नहीं, बल्कि परमार कालीन इंजीनियरिंग पर आधारित है। अधिवक्ता ने बताया कि भोजशाला की नींव अन्य परंपराओं के विपरीत 'उठी हुई नींव' पर आधारित है, जो राजा भोज के समय की निर्माण शैली की पहचान है। खुदाई में मिली भगवान ब्रह्मा की युवा स्वरूप वाली प्रतिमा को भी राजा भोज के काल का बताया गया है।